सैयद सलमान / मुंबई
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन द्वारा घोषित नई केंद्रीय टीम की फेहरिस्त सामने आते ही सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन के साथ-साथ मुस्लिम प्रतिनिधित्व का सवाल एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में आ गया है। संगठन के इस व्यापक फेरबदल में मुस्लिम समाज से सिर्फ दो प्रमुख चेहरे, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में तारिक मंसूर और अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में कुंवर बासित अली शामिल किए गए हैं।
चुनावी प्रयोगशाला
यह महज सांगठनिक नियुक्तियों का फेरबदल नहीं है, यह पिछले दस साल में भाजपा की पूरी तरह बदली हुई विचारधारा और रणनीति का साफ सबूत है।
अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के दौर में आरिफ बेग और सिकंदर बख्त जैसे नेता अग्रिम पंक्ति की पहचान थे। बाद में मुख्तार अब्बास नकवी और सैयद शाहनवाज हुसैन ने केंद्र में मंत्री पद से लेकर राष्ट्रीय पटल तक नुमाइंदगी संभाली। वे पार्टी के चेहरे भर मात्र नहीं थे, बल्कि उसकी विचारधारा का विस्तार थे। उनका होना यह संदेश देता था कि भाजपा का ‘हिंदुत्व’ और ‘राष्ट्रवाद’ सांस्कृतिक आत्मसातीकरण की गुंजाइश रखता है। लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह के मौजूदा दौर में भाजपा ने जिस बहुसंख्यक गोलबंदी और ‘मुस्लिम-मुक्त राजनीति’ के चुनावी समीकरण को साधा है, उसने मुस्लिम प्रतिनिधित्व के पारंपरिक ढांचे को लगभग अप्रासंगिक कर दिया है। संसद के दोनों सदनों यानी लोकसभा और राज्यसभा में सत्ताधारी दल का एक भी मुस्लिम सांसद न होना इस बदले हुए दौर की सबसे मुखर और कड़वी हकीकत है। यह उस ‘मुस्लिम-मुक्त’ राजनीति की तस्दीक करता है, जिसकी ओर पार्टी ने २०१४ के बाद कदम बढ़ाया।
ऐसे परिदृश्य में, जब राष्ट्रीय स्तर पर केवल दो मुस्लिम चेहरों को जिम्मेदारी मिलती है और वे दोनों ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं तो पार्टी का यह कदम सीधे तौर पर चुनावी प्रयोगशाला की सियासी बिसात का हिस्सा नजर आता है। उत्तर प्रदेश देश की सत्ता का केंद्र भी है और हिंदुत्व की सबसे बड़ी सियासी जमीन भी। इस बीच भाजपा नेता रघुराज सिंह जैसे लोग खुले मंचों से एलान करते हैं कि पार्टी को सिर्फ हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के पैरोकारों का वोट चाहिए यानी मुसलमानों की कोई जरूरत नहीं है। वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भाषणों से यदि बुलडोजर, मस्जिद, नमाज और कब्रिस्तान जैसे ध्रुवीकरण वाले प्रतीक हटा दिए जाएं तो शायद ही कोई सियासी नैरेटिव बचे।
महज वोट बैंक
दूसरी तरफ, ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी का यह आह्वान कि मुसलमानों को भाजपा के प्रति अंधविरोध की सियासत छोड़कर सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए, मुस्लिम समाज के भीतर उपजे असमंजस और बेचैनी का आईना है। उनके बयान का आधार सीधे तो नहीं, लेकिन अपरोक्ष रूप से मुसलमानों को भ्रमित करनेवाला है। इस तरह की तीखी और अप्रासंगिक बयानबाजियों के बरअक्स, संगठन में दो मुस्लिम चेहरों को शोपीस की तरह बनाए रखना भाजपा की मजबूरी है। इसे अंतर्राष्ट्रीय और बौद्धिक मंचों पर सर्वसमावेशी छवि का भ्रम बरकरार रखने की एक सुनियोजित कोशिश कहा जा सकता है।
इस पूरी रस्साकशी के केंद्र में वर्ष २०२७ के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हैं। भाजपा की भूमिका स्पष्ट है। वह चाहती है कि बहुसंख्यक वर्ग एकजुट और उसके पक्ष में गोलबंद रहे और मुस्लिम मतदाता समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम और पीस पार्टी जैसे विभिन्न दलों के बीच तितर-बितर होकर बिखर जाएं। वोटों के इस बिखराव में भाजपा बार-बार सफल भी होती रही है। वहीं दूसरी तरफ, तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल भी मुस्लिम समाज को एक सुरक्षित और विवश ‘वोट बैंक’ से ज्यादा कुछ नहीं समझते, जो डर के सहारे स्वत: उनकी झोली में आ गिरते हैं।
जरूरी है राजनीतिक प्रासंगिकता
मुस्लिम समाज के लिए इस दौर में किसी भी अन्य समय से अधिक आत्ममंथन और गहरे सियासी शऊर की उम्मीद की जाती है। सियासी रूप से ऐसे मुश्किल समय में मुस्लिम समाज के लिए सबसे बड़ी दरकार भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से बाहर निकलने की है। भाजपा का थिंक टैंक जिस रणनीति के तहत उसे राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेल रहा है, उसका मुकाबला किसी भावनात्मक प्रतिक्रिया या अंधविरोध से नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में कोई भी समाज अपनी प्रासंगिकता उस वक्त खो देता है जब उसकी राजनीतिक वफादारी तयशुदा मान ली जाती है या फिर उसे पूरी तरह अप्रासंगिक घोषित कर दिया जाता है।
मुस्लिम समाज के लिए अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता और मोलभाव की ताकत को बनाए रखना बेहद जरूरी है। उन्हें २०२७ के चुनाव से पहले बिखराव के जाल से बाहर निकलकर, सूझबूझ, तार्किकता और अधिकार-केंद्रित राजनीति के साथ आगे बढ़ना चाहिए। मुसलमानों को यह तय करना होगा कि वे खंडित होकर अपनी उपयोगिता खो दें या एकजुट होकर एक ऐसी सियासी दिशा चुनें जो उन्हें सिर्फ एक ‘मुद्दा’ नहीं, बल्कि नीति-निर्माण का हिस्सा बनाए।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
