-अमेरिका में संघ पर प्रतिबंध की मांग
-हिंदुत्व की अंतरराष्ट्रीय छवि पर बड़ा धब्बा
-सत्ता की गंदी राजनीति का बिल अब वर्षों तक चुकाएगा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के प्रस्तावित न्यूयॉर्क दौरे से पहले अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की ओर से संघ के खिलाफ प्रतिबंध लगाने, उससे जुड़े नेताओं से दूरी बनाने और लक्षित कार्रवाई की मांग कोई साधारण घटना नहीं है। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए खतरे की घंटी है। उससे भी ज्यादा यह हिंदुत्व की अंतरराष्ट्रीय छवि पर पड़ा ऐसा दाग है, जिसे केवल अमेरिका-विरोधी साजिश कहकर धोया नहीं जा सकता। संघ को अब यह समझना होगा कि यह नौबत अचानक नहीं आई। दशकों की वैचारिक पूंजी पर पिछले वर्षों की सत्ता राजनीति ने इतनी मोटी कालिख पोत दी है कि विदेशों में भाजपा और संघ के बीच फर्क मिटता जा रहा है।
नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राजनीति ने चुनाव जीतने के लिए जिस तरह सत्ता के हर औजार को इस्तेमाल करने के आरोप झेले, उसका खामियाजा अब केवल भाजपा को नहीं, संघ को भी भुगतना पड़ रहा है। विपक्षी दलों के नेताओं पर केंद्रीय जांच एजेंसियों की ताबड़तोड़ कार्रवाई, सरकारें गिराने के आरोप, जनप्रतिनिधियों की कथित खरीद-फरोख्त, विपक्षी दलों में तोड़फोड़ और सत्ता बचाने के लिए राजनीतिक जोड़-तोड़ ने भारतीय लोकतंत्र की छवि को लगातार चोट पहुंचाई है। राजनीति केवल पैâसलों से नहीं, धारणा से भी चलती है। और आज दुनिया में जो धारणा बन रही है, वह संघ के लिए बेहद खतरनाक है।
सबसे बड़ी चोट नफरत की राजनीति ने पहुंचाई है। चुनाव दर चुनाव धार्मिक ध्रुवीकरण, मुसलमानों को लेकर उत्तेजक बयान, अल्पसंख्यकों के खिलाफ बयानबाजी और हिंदू-मुस्लिम विभाजन को राजनीतिक हथियार बनाने के आरोपों ने हिंदुत्व की परिभाषा ही बदल दी है। जिस हिंदुत्व को संघ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बताता रहा, वही विदेशों में अब कट्टर राजनीति और धार्मिक असहिष्णुता के आरोपों के साथ पढ़ा जा रहा है।
यह संघ की सबसे बड़ी वैचारिक हार है। संघ को यह भी पूछना होगा कि गौतम अडानी से सरकार की निकटता ने उसकी छवि को कितना नुकसान पहुंचाया। प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं और अडानी समूह के वैश्विक कारोबारी विस्तार को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। सरकार और अडानी समूह इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं, लेकिन बार-बार उठने वाले सवालों ने यह धारणा जरूर मजबूत की कि सत्ता कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों के लिए जरूरत से ज्यादा झुक रही है।
यदि विदेशों में यह संदेश जाता है कि भारत की राजनीति में सत्ता, कॉरपोरेट और वैचारिक संगठन एक ही छतरी के नीचे खड़े हैं, तो उसका निशाना आखिर कौन बनेगा? सबसे पहले संघ। यही वजह है कि आज संघ को भाजपा के राजनीतिक कर्मों का हिसाब देना पड़ रहा है।
मोदी और शाह कल सत्ता में रहें या न रहें, लेकिन संघ की पहचान बनी रहेगी। सरकारें बदल जाती हैं, नेता बदल जाते हैं, मगर किसी संगठन की अंतरराष्ट्रीय छवि पर लगा दाग दशकों तक पीछा करता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अब तय करना होगा कि वह स्वयं को एक सांस्कृतिक-सामाजिक संगठन के रूप में बचाना चाहता है या भाजपा की हर राजनीतिक करतूत का नैतिक भागीदार बनकर इतिहास में दर्ज होना चाहता है। मोहन भागवत यदि इस अमेरिकी चेतावनी को केवल विदेशी साजिश मानकर टाल देते हैं, तो संघ अपने सामने खड़े असली संकट को नहीं समझ पाएगा। असली संकट अमेरिका नहीं है। असली संकट वह राजनीति है, जिसमें सत्ता के लिए संस्थाओं की साख दांव पर लगाई गई, विपक्ष को दुश्मन बनाया गया, जनप्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त के आरोप सामान्य हो गए, केंद्रीय एजेंसियों पर राजनीतिक इस्तेमाल के सवाल उठे, कॉरपोरेट निकटता विवाद का विषय बनी और नफरत को चुनावी ईंधन बनाया गया। अब उसका बिल संघ के दरवाजे पर पहुंच गया है। और यह बिल पांच साल का नहीं है। संघ को इसकी कीमत वर्षों तक चुकानी पड़ सकती है।
