सना खान
महंगाई सिर्फ जेब नहीं
महाराष्ट्र के एक छोटे शहर में रहने वाले एक परिवार का महीने का बजट पहले से तय है यथा किराया, राशन, बिजली, बच्चों की पढ़ाई और आने-जाने का खर्च। पहले इन सबके बाद कुछ पैसे बच जाते थे। उन्हीं पैसों से महीने में एक बार बाहर खाना या बच्चों की छोटी-सी फरमाइश पूरी हो जाती थी।
अब सवाल बदल गया है
‘क्या खरीदना है?’ से पहले पूछा जाता है, ‘क्या टाल सकते हैं?’ यही महंगाई का नया चेहरा है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
जुलाई २०२६ में भारत की खुदरा महंगाई ४.४५ प्रतिशत और महाराष्ट्र की ४.०९ प्रतिशत रही। ग्रामीण महाराष्ट्र में यह ४.९५ प्रतिशत, जबकि शहरी महाराष्ट्र में ३.५४ प्रतिशत रही। देश की खाद्य महंगाई ५.५२ प्रतिशत रही। प्याज २२.५४ प्रतिशत, लहसुन ३५.३६ प्रतिशत और अदरक ८३.६२ प्रतिशत तक महंगा हुआ।
११ अगस्त से महाराष्ट्र में दूध भी रुपए २ प्रति लीटर महंगा हुआ। रोज दो लीटर दूध लेने वाले परिवार पर करीब रुपए १२० महीने का अतिरिक्त बोझ पड़ा।
एक छोटी-सी कहानी
रविवार को बच्चे ने पूछा-‘मम्मी, आज बाहर खाना खाने चलेंगे?’ मां ने कहा-‘इस रविवार रहने देते हैं, अगले रविवार चलेंगे।’ बच्चे के लिए यह सिर्फ टला हुआ कार्यक्रम था। मां के लिए यह महीने के बजट का पैâसला था। महंगाई सिर्फ खर्च नहीं घटाती, बल्कि जरूरत और इच्छा के बीच का फर्क भी बढ़ाती है। बाहर खाना, घूमना और गैर-जरूरी खरीदारी सबसे पहले टलती है। आंकड़ों में महंगाई ४.०९ प्रतिशत है, लेकिन परिवार के लिए इसका मतलब है कम बचत, ज्यादा हिसाब और कुछ अधूरी खुशियां। सवाल सिर्फ यह नहीं कि महंगाई कितनी बढ़ी? सवाल यह भी है कि क्या बढ़ती कीमतों के बीच आम परिवार अपनी जरूरतें पूरी करते-करते खुशियों से समझौता कर रहा है।
