-कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे चार और जगह धंसा
-१४० मीटर के नए हिस्से पर संकट
-निर्माण एजेंसी दिन-रात मरम्मत में जुटी; उद्घाटन से पहले गुणवत्ता पर फिर सवाल
-अब जरूरत सिर्फ गड्ढे भरने या धंसे हिस्से की मरम्मत की नहीं, बल्कि उन कारणों की तकनीकी जांच की है, जिनकी वजह से नई सड़क बार-बार जमीन में बैठ रही है।
सामना संवाददाता / लखनऊ
आधुनिक तकनीक और ‘गड्ढाकरी स्पेस टेक्नोलॉजी’ के इस्तेमाल से बना कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे लगातार धंसने से सवालों के घेरे में है। बुधवार को एक्सप्रेसवे पर चार और स्थानों पर सड़क धंस गई। करीब १४० मीटर लंबे नए हिस्से में खराबी सामने आने के बाद निर्माण एजेंसी को आनन-फानन में मरम्मत शुरू करनी पड़ी।
एक्सप्रेसवे पर सड़क धंसने की यह पहली घटना नहीं है। लगातार अलग-अलग स्थानों पर सतह बैठने से निर्माण की गुणवत्ता, मिट्टी की सतह, ड्रेनेज और तकनीकी निगरानी को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जिस परियोजना को अत्याधुनिक तकनीक और तेज रफ्तार कनेक्टिविटी के मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा है, वहां बार-बार सड़क का धंसना एजेंसियों के दावों की परीक्षा ले रहा है। बताया जा रहा है कि प्रभावित हिस्सों की पहचान होते ही निर्माण एजेंसी ने मशीनें और कर्मचारियों को लगाकर मरम्मत तेज कर दी है। दिन-रात काम कर सड़क को दोबारा दुरुस्त करने की कोशिश की जा रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि एक्सप्रेसवे के पूरी तरह संचालन में आने से पहले ही सड़क के हिस्से बैठ रहे हैं, तो भारी और लगातार यातायात शुरू होने के बाद इसकी मजबूती कितनी टिकाऊ रहेगी? बता दें कि कानपुर-लखनऊ लेन पर कोरारी टोल गेट के पास पांच दिन पहले ३० मीटर में भारी वाहन वाली लेन की मरम्मत कराई गई थी। यहां दूसरी लेन धंस गई है। किलोमीटर संख्या ६५.३ से ६५.४ के बीच करीब पचास मीटर में ओवरटेक लेन धंसी है। किमी संख्या ६२.७ से ६२.८ के बीच ३० मीटर सड़क दब गई है।
सड़क या भ्रष्टाचार का ‘एक्सपेरिमेंट?’
बार-बार धंसते एक्सप्रेसवे ने विकास के दावों की पोल खोल दी है। करोड़ों-अरबों खर्च होने के बाद भी सड़क अगर बारिश में बैठ जाए, तो सवाल सिर्फ इंजीनियरिंग का नहीं, गुणवत्ता और निगरानी का भी है। आखिर निर्माण में क्या खामी रह गई? घटिया सामग्री लगी या मानकों की अनदेखी हुई? जनता टैक्स दे और हर बारिश में सड़क धंसने का तमाशा देखे, यह वैâसा विकास?
