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रुख-ए-सियासत : हज २०२७ का २,७०० करोड़ रुपए का सवाल… सबसे महंगी कंपनी पर मेहरबानी क्यों?

तौसीफ कुरैशी

हज इबादत है। दुनिया के करोड़ों मुसलमानों के लिए जिंदगी का सबसे पाक सफर। कोई अपनी जमा-पूंजी लगाता है, कोई सालों तक पाई-पाई जोड़ता है और कोई अपनी छोटी-छोटी जरूरतें काटकर इस सफर का इंतजार करता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हिंदुस्थान में हज अब इबादत कम और सरकारी ठेकों का बाजार ज्यादा बना दिया जा रहा है? हज २०२७ के लिए भारतीय हाजियों को सेवाएं देने वाले लगभग २,७०० करोड़ रुपए के टेंडर को लेकर जो आंकड़े सामने आए हैं, वे सिर्फ सवाल नहीं खड़े करते, बल्कि जवाब मांगते हैं। टेंडर चार्ट के मुताबिक, श्/ए श्aेप्arग्q Aत्-श्ल्ूaस्aब्गर््ैaप् ण्द. ने प्रति हाजी ८,७१७.०१ सऊदी रियाल का रेट दिया। उसका सऊदी हज मंत्रालय की रैंकिंग में स्थान ७ और स्कोर ८६.५५ बताया गया है। दूसरी तरफ श्/ए घ्ूप्ra Aत्-ख्प्aग्r ण्द. का रेट ९,७७७ रियाल, रैंक ९ और स्कोर ८५.६८ है। तीसरी कंपनी का रेट भी घ्ूप्ra से कम है। अब सामान्य आदमी पूछेगा कि सबसे कम रेट और बेहतर स्कोर वाली कंपनी को छोड़कर ज्यादा महंगी कंपनी को चुनने की तैयारी क्यों? सरकार ने जनता को एक नारा खूब सुनाया था ‘ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा।’ अब जनता पूछ रही है कि सरकार खा नहीं रही, यह मान भी लें जबकि ऐसा सौ फीसद नही माना जा सकता है, भ्रष्टाचार का हलवा बनने के बाद सब में बंटता है, तभी भ्रष्टाचार का हलवा बनाने वाले सुरक्षित रहते है यही प्रमाण होता सब मिलकर किया जाता है, क्या अपने मित्रों को खाने दे रही है फिर खा रही है? या फिर सरकार के हाथ में कंट्रोल रखने की ताकत ही खत्म हो गई है? हिसाब बहुत सीधा है। यदि लगभग १,२२,५१८ हाजियों के लिए सस्ती कंपनी का प्रस्ताव स्वीकार किया जाए तो अनुमानित खर्च करीब २,४०३ करोड़ रुपए बैठता है। महंगी कंपनी के साथ यही खर्च करीब २,६९५ करोड़ रुपए पहुंचता है। यानी लगभग २९२ करोड़ रुपए का अंतर। यह कोई सरकारी फाइल में पड़ा हुआ आंकड़ा नहीं है।

यह फर्क उस हाजी की जेब से निकल सकता है, जो शायद पांच-दस साल से हज के लिए बचत कर रहा है। प्रति हाजी लगभग २३,००० रुपए से २४,००० रुपए ज्यादा का बोझ क्यों डाला जाए? और अगर तर्क ैंण्ँए का है तो सवाल और बड़ा हो जाता है। जब गुणवत्ता और कीमत दोनों के पैमानों पर सस्ती कंपनी मजबूत दिखाई दे रही है, तो फिर महंगी कंपनी को फायदा किस गणित से मिल रहा है?

ऐसा कौन-सा गणित है, जिसमें कम कीमत वाला भी पीछे और बेहतर स्कोर वाला भी पीछे? बताया जा रहा है कि यही कंपनी लगातार कई वर्षों से ठेका हासिल करती रही है और इस बार चौथी बार मौका देने की तैयारी है। यदि यह सही है तो मंत्रालय को और अधिक पारदर्शिता दिखानी चाहिए। बार-बार एक ही नाम के आसपास फाइल क्यों घूमती है? केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय, हज कमेटी और जद्दाह स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास को इस मामले पर खुलकर जवाब देना चाहिए। टेंडर की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक कीजिए। मूल्यांकन के अंक बताइए। ैंण्ँए का फार्मूला बताइए। और सबसे जरूरी यह बताइए कि सबसे कम कीमत वाले प्रस्ताव को छोड़कर ज्यादा महंगे प्रस्ताव को चुनने का आधार क्या है? किरण रिजिजू, नदी में डुबकी लगाने से शरीर का मैल उतर सकता है, लेकिन टेंडर पर उठे सवालों का मैल नहीं उतरता। उसके लिए जवाब देना पड़ता है। हज इबादत है, उसे ठेके की सियासत मत बनाइए। हाजियों की जेब पर २९२ करोड़ रुपए का सवाल है। जवाब दीजिए, वरना लोग पूछेंगे यह हज की सेवा है या हाजियों का हजाम?
सत्यमेव जयते

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