मुख्यपृष्ठनए समाचार`वोट हटाना, भाजपा को चुनाव जिताने की मुहिम'

`वोट हटाना, भाजपा को चुनाव जिताने की मुहिम’

-एसआईआर पर कपिल सिब्बल का बड़ा आरोप
-सुप्रीम कोर्ट से प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। पूर्व केंद्रीय मंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि विभिन्न राज्यों में जारी मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) भाजपा को चुनाव जीतने में मदद करने के उद्देश्य से किया जा रहा है। सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि एसआईआर के जरिए उन मतदाताओं को निशाना बनाया जा सकता है, जिन्हें बीजेपी का समर्थक नहीं माना जाता।
पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल का यह बयान झारखंड के गोड्डा से जुड़ी एक मीडिया रिपोर्ट के बाद आया, जिसमें बीजेपी एजेंटों पर खासकर अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम हटाने की मांग करने का आरोप लगाया गया था। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष से पहले आधिकारिक जांच जरूरी है। अब सवाल यही है कि एसआईआर वोटर लिस्ट को साफ करने की प्रक्रिया है या वोट काटने का हथियार?
`एसआईआर में उन्हीं के नाम कटेंगे, जो बीजेपी को वोट नहीं देंगे!’
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने मीडिया से बात करते हुए, चुनाव आयोग के अध्यक्ष ज्ञानेश कुमार पर भी आरोप लगाए हैं। सिब्बल ने झारखंड और दिल्ली में चल रही एसआईआर प्रक्रिया पर कहा, इसके पीछे ज्ञानेश कुमार का मकसद है, एसआईआर के जरिए भाजपा के लोगों को मौके मिलें। क्योंकि इसमें उन्हीं लोगों के नाम कटेंगे, जो उन्हें वोट नहीं देने वाले। सिब्बल ने कहा, ये बड़े दुख की बात है कि इसका संज्ञान अदालत भी नहीं करती है। उन्होंने कहा, अगर गरीब आदमी का नाम वोटर लिस्ट से कट जाए, तो इसके बड़े नुकसान होते हैं। उनके पास कोई साधन भी नहीं है कि वह सीधे अपना नाम जुड़वा सकें।
`अगर कोर्ट ने ध्यान नहीं दिया तो लोकतंत्र मुश्किल में पड़ेगा’
कपिल सिब्बल ने कहा कि अगर अदालत यह मानकर चलती है कि एसआईआर की पूरी प्रक्रिया चुनाव आयोग की निगरानी में हो रही है और इसलिए इसमें किसी तरह की गड़बड़ी नहीं हो सकती, तो यह चिंता का विषय होगा। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर चुनाव में वोट डालने के अधिकार पर पड़ता है। इसलिए इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बेहद जरूरी है।

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