-ई राज
१० नवंबर २०२५ की वो शाम दिल्ली के लिए किसी आम शाम जैसी थी। चांदनी चौक की गलियों में चहल-पहल थी और लाल किले के आसपास गाड़ियों का शोर। लेकिन इस भीड़-भाड़ के बीच एक हुंडई ग्२० कार धीरे-धीरे रेंग रही थी, जिसके भीतर तबाही का सामान छुपा हुआ था।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा दाखिल चार्जशीट ने इस दिल दहला देने वाली वारदात की एक-एक कड़ी खोलकर रख दी है।
जब बदलना पड़ा पहला टारगेट
जांच में खुलासा हुआ कि आतंकी और कथित मास्टरमाइंड डॉक्टर उमर-उन-नबी का पहला निशाना लाल किला नहीं, बल्कि चांदनी चौक स्थित प्रसिद्ध लाल मंदिर था। शाम करीब ६:३७ बजे उमर विस्फोटक से लदी गाड़ी लेकर लाल मंदिर के आसपास मंडरा रहा था। लेकिन किस्मत से वहां भारी ट्रैफिक, सुरक्षा बलों की मुस्तैदी और भारी भीड़ थी। परिस्थितियां अनुकूल न देखकर उसने कार का रुख तुरंत लाल किले की ओर मोड़ दिया।
जूते के नीचे दबा था ‘मौत का बटन’
शाम ६:५० बजे लाल किले के गेट नंबर ४ के पास एक जोरदार धमाका हुआ। इस ब्लास्ट में ११ लोगों की जान चली गई और २९ लोग घायल हो गए।
शुरुआत में लगा कि धमाका गलती या हड़बड़ाहट में हुआ होगा, लेकिन सच इससे कहीं ज्यादा भयानक था। फोरेंसिक जांच में उमर के लाल रंग के जूते से एक विशेष ‘पीजोइलेक्ट्रिक प्लेट का मेटल पार्ट मिला। उमर ने बम का रिमोट अपने जूते की एड़ी के नीचे छिपा रखा था। जैसे ही उसने अपने पैर से दबाव बनाया, यांत्रिक ऊर्जा बिजली में बदली और पूरी कार बारूद के ढेर में तब्दील हो गई।
यूरिया, एआई और कमरे में बंद राज
चार्जशीट के मुताबिक, इस साजिश को अंजाम देने के लिए अल-कायदा समर्थित संगठन ‘अंसार गजवत-उल-हिंद’ के आतंकियों ने एआई (चैटजी पीटी) और यूट्यूब का सहारा लेकर आई ई डी बनाना सीखा था।
फरार रहने के दौरान उमर नुह (हरियाणा) के एक कमरे में छुपा हुआ था। पकड़ में न आने के डर से वह कमरे से बाहर तक नहीं निकलता था, यहां तक कि अपना यूरिन भी पॉलीथिन बैग में जमा करता था, ताकि कमरे में जमी यूरिया से विस्फोटक बनाने की जानकारी जुटाई जा सके।
अपनी जान देकर लोकतंत्र को चोट पहुंचाने की इस साजिश का अंत आखिरकार लाल किले की दीवारों के पास उसी कार के मलबे में हो गया, लेकिन पीछे छूट गए कई खौफनाक सवाल।
