‘मार्जिन मनी’ कर्ज की सिफारिश से मंत्री बाहर; अधिकारियों की समिति को सौंपी जिम्मेदारी
सुनील ओसवाल / मुंबई
महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार में सत्ता के भीतर अधिकारों को लेकर एक नया सवाल खड़ा हो गया है। अजीत पवार गुट के सहकार मंत्री बाबासाहेब पाटील के अधिकारों में कटौती किए जाने से राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) से ‘मार्जिन मनी’ कर्ज के लिए सहकारी चीनी मिलों की सिफारिश करने की प्रक्रिया में सरकार ने बड़ा बदलाव किया है। नई व्यवस्था में सहकार मंत्री को इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया है और पूरी छानबीन की जिम्मेदारी अधिकारियों की समिति को सौंप दी गई है।
पहले एनसीडीसी से कर्ज के लिए पात्र चीनी मिलों के प्रस्ताव सहकार मंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिमंडलीय उपसमिति के समक्ष भेजे जाते थे। इस समिति को कर्ज मांगने वाले प्रस्तावों की सिफारिश करने का अधिकार था। यानी चीनी मिलों को आर्थिक सहायता दिलाने की प्रक्रिया में सहकार मंत्री की महत्वपूर्ण भूमिका थी, लेकिन अब सरकार ने आर्थिक और तकनीकी छानबीन के लिए गठित अलग-अलग समितियों को समाप्त कर दोनों को एक ही समिति में विलीन कर दिया है। इस समिति की अध्यक्षता अब चीनी आयुक्त करेंगे। इसके साथ ही सहकार राज्यमंत्री और चीनी आयुक्त को शामिल करने वाली मंत्री-समिति भी रद्द कर दी गई है। नई समिति में महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक, वसंतदादा शुगर इंस्टीट्यूट, चीनी आयुक्त कार्यालय के वित्त एवं प्रशासन विभाग के अधिकारी, सह-निबंधक (लेखापरीक्षक) तथा सह-संचालक (उप-उत्पाद) सहित संबंधित विभागों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समिति भविष्य में आने वाले प्रस्तावों की आर्थिक और तकनीकी जांच करेगी। साथ ही यह भी तय करेगी कि संबंधित चीनी मिल आर्थिक रूप से पुनर्जीवित होकर भविष्य में प्रभावी ढंग से चलने की स्थिति में है या नहीं।
सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल
सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि जब पहले इस प्रक्रिया में सहकार मंत्री की भूमिका थी, तो अब उन्हें इससे बाहर रखने की जरूरत क्यों पड़ी? सरकार के इस पैâसले को अजीत पवार गुट के मंत्री के अधिकारों में कटौती के रूप में देखा जा रहा है। सहकार विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पास वित्त विभाग भी है। ऐसे में प्रस्तावों की सिफारिश सहकार मंत्री के माध्यम से करना ‘शिष्टाचार’ के अनुरूप नहीं था। इसी कारण अधिकारियों की एक ही समिति के माध्यम से आर्थिक और तकनीकी जांच कराने का निर्णय लिया गया। हालांकि, सरकार की यह दलील राजनीतिक सवालों को खत्म करने के बजाय उन्हें और हवा दे रही है। सवाल यह है कि यदि ‘शिष्टाचार’ के नाम पर मंत्री को प्रक्रिया से बाहर किया जा सकता है, तो फिर मंत्रियों को दिए गए अधिकारों का अर्थ क्या रह जाता है?
सत्ता में मंत्री, अधिकार अफसरों के पास?
महाराष्ट्र सरकार में पहले से ही विभागों के अधिकारों और सत्ता संतुलन को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। अब सहकार मंत्री के अधिकारों में बदलाव ने इस बहस को और तेज कर दिया है। अजीत पवार गुट के मंत्री को महत्वपूर्ण आर्थिक निर्णय प्रक्रिया से बाहर किए जाने से यह सवाल भी उठ रहा है कि सरकार के भीतर सहयोगी दलों के मंत्रियों को वास्तविक रूप से कितने अधिकार हासिल हैं। ‘मार्जिन मनी’ जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक पैâसलों में मंत्री की भूमिका कम कर अधिकारियों की समिति को प्रमुख भूमिका देना महज प्रशासनिक बदलाव है या इसके पीछे सत्ता के भीतर अधिकारों का कोई बड़ा समीकरण है। इस पर आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस तेज होने की संभावना है।
