-कागजी पुरस्कारों और जमीनी हकीकत का कड़वा सच
सुरेश गोलानी / मुंबई
मुंबई के गोरेगांव में स्थित बॉम्बे एक्जीबिशन सेंटर में चल रहे तीन दिवसीय सीवेज प्रौद्योगिकी के लिए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले (आइएफएटी-इंडिया २०२६ ) में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल मीरा भायंदर महानगरपालिका के आयुक्त राधाबिनोद ए. शर्मा ३ से १० लाख की आबादी वाले शहरों की श्रेणी में भारत का नंबर एक सबसे स्वच्छ शहर चुने जाने पर वाह-वाही बटोर कर दूसरों को सोर्स सेग्रीगेशन (गीला सूखा कचरा अलग न करना) की नसीहत तो दें रहे है लेकिन जमीनी हकीकत और प्रशासनिक दावों के बीच बड़ा अंतर है। आयुक्त के भाषणों में भले ही ‘सोर्स सेग्रिगेशन’ को एकमात्र रास्ता बताया गया हो, लेकिन असलियत यह है कि आज भी शहर के अधिकांश घरों और सोसायटियों से बिना अलग किया हुआ (मिश्रित) कचरा निकलता है। दूसरी तरफ स्थानीय नागरिक शिकायत करते रहे हैं कि कई मुख्य सड़कों, सब्जी मंडियों और अंदरूनी इलाकों में समय पर कचरा नहीं उठाया जाता। जगह-जगह कचरे के ढेर नागरिकों के लिए एक बड़ा सिरदर्द बने हुए है। आयुक्त कागज़ी पुरस्कारों का श्रेय सफाई कर्मचारियों को तो देते है लेकिन स्वच्छता के असली हीरो कहे जाने वाले सफाईकर्मी हाथों के दस्ताने, गमबूट और फेस मास्क जैसे बुनियादी सुरक्षा उपकरणों (पीपीई) के बिना शहर में कचरा साफ और इकट्ठा करके अपनी जान जोखिम में डाल रहे है। मनपा के स्वच्छता विभाग से जुड़े निरीक्षक और अधिकारी सब कुछ जानकर भी ठोस अपशिष्ट (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम (एमएसडब्ल्यू रूल्स) और मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार का निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम के खुलेआम हो रहे उल्लंघन को नजरंदाज कर रहें है।
