मुख्यपृष्ठनए समाचारसीजेआई बोले : न्यायपालिका जांच के दायरे से बाहर नहीं रह सकती

सीजेआई बोले : न्यायपालिका जांच के दायरे से बाहर नहीं रह सकती

-सीजेआई सूर्यकांत ने न्यायपालिका की जवाबदेही पर उठाया गंभीर मुद्दा
सामना संवाददाता/ नई दिल्ली
जनता के सवालों, आलोचना और जांच का सामना करने के लिए न्यायालयों को तैयार रहना ही चाहिए। और जनता का विश्वास हासिल करने के लिए न्यायालय खुद को जांच के दायरे से बाहर नहीं रख सकते। यह महत्वपूर्ण टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सोमवार को की।
राजधानी दिल्ली में आयोजित छठे ‘राम जेठमलानी स्मृति व्याख्यानमाला’ कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने यह गंभीर मुद्दा उठाया। न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों और न्यायपालिका की जवाबदेही जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर मुख्य न्यायाधीश ने अपनी बेबाक राय रखी। `न्यायपालिका जनता की ओर से होने वाली आलोचना को नजरअंदाज नहीं कर सकती। न्यायालयों के कामकाज की निष्पक्ष और रचनात्मक आलोचना जीवंत संवैधानिक लोकतंत्र की कानूनी तथा आवश्यक विशेषता है। इसलिए न्यायालयों को जहां आवश्यक हो, वहां होने वाली आलोचना का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।’
केवल सुनवाई का खुला होना पारदर्शिता नहीं!
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायालयीन कामकाज में पारदर्शिता का अर्थ केवल खुले न्यायालय और सार्वजनिक सुनवाई तक सीमित नहीं है। न्यायालयों को अपने फैसला के पीछे के तर्क और कारण स्पष्ट करने आवश्यक हैं। इससे उनके फैसला जनता की जांच और समीक्षा के लिए खुले रहते हैं।
राम जेठमलानी की विरासत के बीच बड़ा संदेश
राम जेठमलानी अपनी बेबाक कानूनी लड़ाइयों और सत्ता से सवाल पूछने वाले अंदाज के लिए जाने जाते थे। ऐसे समय में उनके स्मृति कार्यक्रम से सीजेआई सूर्यकांत का पारदर्शिता और जनता के भरोसे पर जोर देना अपने आप में महत्वपूर्ण संदेश बन जाता है। न्यायपालिका की असली प्रतिष्ठा उसके अधिकार में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास में है। सत्ता हो, विपक्ष हो या आम नागरिक, कानून के सामने सब बराबर हैं, लेकिन इस बराबरी का भरोसा तभी मजबूत होगा, जब न्याय की प्रक्रिया भी पारदर्शी दिखाई दे। सीजेआई सूर्यकांत का संदेश इसी बुनियादी सच की याद दिलाता है, न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए।

`न्यायपालिका जनता की ओर से होने वाली आलोचना को नजरअंदाज नहीं कर सकती। न्यायालयों के कामकाज की निष्पक्ष और रचनात्मक आलोचना जीवंत संवैधानिक लोकतंत्र की कानूनी तथा आवश्यक विशेषता है। इसलिए न्यायालयों को जहां आवश्यक हो, वहां होने वाली आलोचना का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।’
-सूर्यकांत, मुख्य न्यायधीश

न्यायपालिका की असली प्रतिष्ठा उसके अधिकार में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास में है। सत्ता हो, विपक्ष हो या आम नागरिक, कानून के सामने सब बराबर हैं, लेकिन इस बराबरी का भरोसा तभी मजबूत होगा, जब न्याय की प्रक्रिया भी पारदर्शी दिखाई दे। सीजेआई सूर्यकांत का संदेश इसी बुनियादी सच की याद दिलाता है, न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए।

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