महाराष्ट्र के हुक्मरान दिन-रात तेज तरक्की की शेखी बघारते नहीं थकते, लेकिन यह तेज तरक्की आज तक राज्य के दूर-दराज आदिवासी इलाकों तक नहीं पहुंच पाई है। इलाज के लिए गरीब आदिवासियों की बदहाली और दर-दर भटकना बदस्तूर जारी है। गर्भवती आदिवासी महिलाओं का मीलों तक `झोली’ में होने वाला सफर यह हुक्मरान रोक नहीं पाए हैं। नंदुरबार जिले के वेहगी बारीपाड़ा की एक गर्भवती आदिवासी महिला को प्रसव के लिए रात के अंधेरे में झोली में पूरे सात किलोमीटर की `यात्रा’ करनी पड़ी। बारीपाड़ा की फुलवंती देवराम पाडवी नामक गर्भवती महिला को शनिवार आधी रात को प्रसव पीड़ा शुरू हुई। लेकिन वहां की नदी पर न तो पुल है, न सड़क। आखिरकार रिश्तेदारों ने बांस की झोली बनाई और फुलवंती पाडवी को लेकर टॉर्च की रोशनी में वेहगी गांव तक सात किलोमीटर का सफर पैदल तय किया। वहां से किसी दूसरे वाहन से पिंपलखुटा स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे। सुबह वहां प्रसव होने के तुरंत बाद दोपहर में मां और नवजात शिशु को दोबारा वही सात किलोमीटर का `झोली सफर’ उल्टा तय करना पड़ा। राज्य सरकार स्वास्थ्य सेवाओं में
सुधार के बड़े-बड़े दावे
करती है, लेकिन आदिवासी इलाकों में आज भी न मरीजों के लिए एंबुलेंस हैं, न मृतकों के लिए शववाहन हैं, न स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचने के लिए सड़कें हैं। उन इलाकों में स्वास्थ्यकर्मी, जरूरी दवाएं तथा चिकित्सा सुविधाएं मौजूद नहीं हैं। नंदुरबार से लेकर गढ़चिरौली तक महाराष्ट्र के दुर्गम इलाकों की स्वास्थ्य सेवाओं की यही भयानक दुर्दशा है। मार्च के बजट में राज्य सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर कई घोषणाएं की थीं, लेकिन वे घोषणाएं या तो हवा में उड़ गर्इं या फिर बदइंतजामी की भेंट चढ़ गर्इं। नतीजा यह है कि विद्यार्थियों को रस्सी के पुल से स्कूल आना-जाना पड़ रहा है। सोने के लिए खाट न होने के कारण जमीन पर सोई आदिवासी बच्चियों की सांप के काटने से मौत हो रही है। कुपोषण तो जैसे आदिवासी बच्चों की नियति बन चुका है और कुपोषित बच्चों की मौत आदिवासी मां-बाप का मुकद्दर। महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की यह हकीकत बेहद खौफनाक है, फिर भी यह हुक्मरानों को विचलित नहीं करती। डायरिया और सिकल सेल जैसी
बीमारियों का जानलेवा घेरा
और आदिवासी इलाकों की ये गंभीर समस्याएं कोई आज की नहीं हैं। मुंबई हाई कोर्ट ने कुछ समय पहले कुपोषण से लगातार होने वाली आदिवासी बच्चों की मौतों पर सरकार को सख्त फटकार लगाई थी। `आदिवासी बच्चों का कुपोषण कोई अलग समस्या नहीं है, बल्कि यह सरकारी तंत्र की नाकामी है,’ इस तरह मुंबई हाई कोर्ट ने सत्ताधारियों के कान उमेठे थे। लेकिन सुस्त हुक्मरानों और बेपरवाह स्वास्थ्य तंत्र पर इसका कोई असर नहीं हुआ है। मेलघाट में कुपोषित आदिवासी बच्चों की मौतें जारी ही हैं। नंदुरबार के बारीपाड़ा की गर्भवती आदिवासी महिला को सड़क न होने के कारण झोली में सात किलोमीटर का सफर तय करना ही पड़ा। गढ़चिरौली में एंबुलेंस न मिलने के कारण मां-बाप को अपने दो बच्चों के शवों को कंधों पर लादकर १५ किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। मुख्यमंत्री फडणवीस ने हाल ही में राज्य की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को `डिजिटल’ और `स्मार्ट’ बनाने का एलान किया है। मुख्यमंत्री महोदय, पहले आदिवासियों के इलाज के लिए होने वाली यह बदहाली और उनका इलाज के लिए दर-बदर भटकना बंद करवाइए और फिर डिजिटल व स्मार्ट सरकारी स्वास्थ्य सेवा की डींगें हांकिए!
