-अमेरिकी १० वर्षीय बॉन्ड प्रतिफल ५ प्रतिशत पार;
-जी-७ देशों की औसत दर वित्तीय संकट के बाद सबसे ऊंची
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
दुनिया एक बार फिर महंगे कर्ज के दौर में प्रवेश करती दिख रही है। अमेरिकी १० वर्षीय सरकारी बॉन्ड का प्रतिफल ५ प्रतिशत पार कर गया है, जबकि जी-७ देशों की औसत उधारी लागत वैश्विक वित्तीय संकट के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है।
बॉन्ड प्रतिफल बढ़ने का सीधा मतलब है कि सरकारों को बाजार से पैसा उधार लेने के लिए ज्यादा ब्याज देना पड़ेगा। इसका असर सरकारी बजट पर पड़ता है और कल्याणकारी योजनाओं तथा विकास परियोजनाओं के लिए उपलब्ध धन पर दबाव बढ़ सकता है। तेल की ऊंची कीमतें और महंगाई केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरें ऊंची रखने या बढ़ाने के लिए मजबूर कर सकती हैं। यदि ऐसा होता है तो घर, वाहन और कारोबार के कर्ज भी महंगे हो सकते हैं।
भारत सीधे जी-७ का हिस्सा नहीं है, लेकिन वैश्विक वित्तीय बाजार आपस में जुड़े हुए हैं। अमेरिकी बॉन्ड पर ऊंचा प्रतिफल विदेशी निवेशकों को उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिका की ओर ले जाने के लिए प्रेरित कर सकता है। इससे रुपए और शेयर बाजार पर दबाव पड़ सकता है। २००८ के संकट का स्वरूप अलग था, इसलिए दोनों परिस्थितियों को समान नहीं कहा जा सकता। लेकिन महंगे कर्ज का मौजूदा दौर वैश्विक विकास की रफ्तार जरूर धीमी कर सकता है।
सरकार का कर्ज महंगा होता है तो उसकी कीमत अंततः करों में बढ़ोतरी, सरकारी खर्च में कटौती या महंगे बैंक ऋण के रूप में जनता तक पहुंच सकती है।
