-शिंदे गुट की बैठक में विधायक का छलका दर्द;
-बोले-सरकार में भाजपा ही हावी, जनता के काम कराने की भी स्थिति नहीं
सामना संवाददाता / मुंबई
राज्य की महायुति सरकार में सत्ताधारी तीनों दलों के बीच खींचतान बढ़ती जा रही है। अब सरकार में शामिल शिंदे गुट के भीतर से ही काम न होने और भाजपा के हावी होने को लेकर नाराजगी के सुर खुलकर सामने आने लगे हैं। नंदुरबार में आयोजित शिंदे गुट की एक बैठक में पार्टी के वरिष्ठ विधायक चंद्रकांत रघुवंशी ने मंच से ही अपनी सरकार और पार्टी के मंत्रियों के सामने कार्यकर्ताओं तथा विधायकों की मुश्किलें रख दीं। मंत्री उदय सामंत और मंत्री गुलाबराव पाटील की मौजूदगी में रघुवंशी ने दो टूक कहा कि मंत्रियों से कार्यकर्ताओं के घर जाकर भोजन करने की अपेक्षा नहीं है, लेकिन कम से कम ऐसी व्यवस्था तो होनी चाहिए कि पार्टी के पदाधिकारी और विधायक जनता के काम करा सकें। उन्होंने साफ चेतावनी दी कि यदि यही स्थिति रही तो अगले चुनाव में शिंदे गुट का सूपड़ा साफ हो जाएगा।
रघुवंशी ने कहा कि जिले में पार्टी के कार्यकर्ताओं और विधायकों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जिले के अधिकांश महत्वपूर्ण पदों पर भाजपा का कब्जा है। भाजपा के नेता और पदाधिकारी आक्रामक तरीके से काम कर रहे हैं, जबकि हमारे पदाधिकारियों को जनता के काम कराने के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है। सत्ता में साझेदार होने के बावजूद यदि अपने ही कार्यकर्ताओं के काम नहीं हो रहे हैं तो संगठन के सामने गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
भाजपा हावी, सहयोगी बेबस?
नंदुरबार की बैठक में विधायक की नाराजगी ने महायुति के भीतर सत्ता के संतुलन को लेकर चल रही चर्चाओं को फिर हवा दे दी है। सत्ता में तीन दलों की भागीदारी होने के बावजूद महत्वपूर्ण पदों और प्रशासनिक स्तर पर भाजपा का प्रभाव अधिक होने की शिकायत शिंदे गुट के भीतर से ही सामने आना सहयोगी दल के लिए चिंता का विषय है। कार्यकर्ताओं और विधायकों को यदि अपने ही सरकार में जनता के काम कराने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है तो इसका सीधा असर संगठन की जमीनी ताकत पर पड़ सकता है।
‘इनकमिंग’ के बीच संगठन की चुनौती
एकनाथ शिंदे गुट चुनावों से पहले दूसरे दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने पाले में लाने की कोशिश करता रहा है। नए नेताओं और कार्यकर्ताओं को विकास निधि तथा उनके काम कराने का भरोसा भी दिया जाता है। लेकिन नंदुरबार की बैठक में सामने आया असंतोष बताता है कि केवल ‘इनकमिंग’ बढ़ाना ही संगठन मजबूत करने के लिए पर्याप्त नहीं है। पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं और मौजूदा पदाधिकारियों को यदि सत्ता में प्रभाव और जनता के काम कराने की ताकत नहीं मिली तो इसका राजनीतिक खामियाजा आगामी चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।
