शीतल अवस्थी
एक बार भगवान गणेश अपने भक्तों के यहां से भरपूर मोदक और लड्डू ग्रहण करके मूषक पर सवार होकर लौट रहे थे। मार्ग में मूषक किसी सर्प को देखकर घबरा गया और उछल पड़ा। इससे गणेशजी नीचे गिर गए और उनका पेट फट गया। पेट से निकले मोदकों को उन्होंने दोबारा अंदर रखा और उसी सर्प को पेट पर बांध लिया। आकाश में बैठे चंद्रदेव यह दृश्य देखकर हंसने लगे। उन्हें अपने सुंदर स्वरूप पर बहुत अभिमान था। चंद्रमा के उपहास से गणेशजी क्रोधित हो गए। उन्होंने श्राप दिया, “तुम्हें अपने रूप पर अत्यधिक घमंड है, इसलिए आज से तुम्हारा तेज समाप्त हो जाएगा। जो भी तुम्हें देखेगा, उस पर चोरी अथवा झूठा कलंक लगेगा।” श्राप के प्रभाव से चंद्रमा का प्रकाश लुप्त हो गया। संसार में अंधकार छा गया और देवता चिंतित हो उठे। चंद्रदेव को अपनी भूल का अहसास हुआ। उन्होंने भगवान गणेश की पूजा करके क्षमा मांगी। गणेशजी ने कहा कि दिया हुआ श्राप पूरी तरह वापस नहीं लिया जा सकता, लेकिन उसका प्रभाव सीमित किया जा सकता है। उन्होंने वरदान दिया कि चंद्रमा की कलाएं घटेंगी और बढ़ेंगी तथा पूर्णिमा को वह अपने पूर्ण स्वरूप में दिखाई देगा। किंतु भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी अर्थात गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन करने वाले व्यक्ति को झूठे आरोप या कलंक का सामना करना पड़ सकता है।
मान्यता है कि भूलवश इस दिन चंद्रमा के दर्शन हो जाएं तो भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए और स्यमंतक मणि की कथा सुननी चाहिए। इस मंत्र का जाप भी किया जाता है—
सिंहः प्रसेनमवधीत्, सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥
यह कथा संदेश देती है कि रूप, ज्ञान या सामर्थ्य का अहंकार नहीं करना चाहिए और किसी की असहाय अवस्था का उपहास करना अनुचित है।
