विजयशंकर चतुर्वेदी
‘ब्रिक्स’ जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का अपना एक खास सौंदर्यशास्त्र होता है। चमकीली बत्तियां और सजे हुए मार्ग, भव्य होटल और दिव्य आयोजन स्थल, फिर राष्ट्राध्यक्षों की सौहार्दपूर्ण तस्वीरें और अंत में जारी होने वाले भारी-भरकम घोषणा-पत्र। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस शिखर सम्मेलन की उपलब्धियों का जो ब्योरा जनता के सामने परोसा है, वह किसी पीआर एजेंसी का काम लगता है। उनसे पूछा जाना चाहिए कि इस पूरी कवायद से देश के नागरिकों को वास्तविक धरातल पर क्या हासिल हुआ? और यह भी कि जो हासिल नहीं हो सका, उसे एक महंगे आयोजन की चकाचौंध के बीच क्यों छिपाया जा रहा है?
जनता पर पहरा और पर्दों में ढंकी गरीबी
ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अप्रâीका के अंग्रेजी नामों के पहले अक्षरों से बने ‘ब्रिक्स’ के आधिकारिक दस्तावेजों में इस साझेदारी को आम लोगों के हितसाधन का माध्यम बताया गया है, लेकिन इस तथाकथित जन-केंद्रित व्यवस्था का स्वाद सबसे पहले दिल्ली के आम नागरिकों को ही चखाया गया। आयोजन का भौकाल बनाने के लिए जनता को सड़कों से बेदखल कर दिया गया, बच्चों के स्कूल बंद कर दिए गए, व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हुर्इं और चारों तरफ सुरक्षाकर्मियों का सख्त पहरा बिठा दिया गया। लोकतंत्र की इस नई व्याख्या में अंतरराष्ट्रीय सफलता की पहली शर्त ही शायद यह है कि विदेशी मेहमानों के स्वागत में अपने नागरिक कुछ दिनों के लिए अपने ही शहर में बंदी बना दिए जाएं।
यह पहली बार नहीं था जब किसी अंतर्राष्ट्रीय आयोजन के दौरान गरीबी को ढांपने की ऐसी अपमानजनक व्यवस्था की गई हो। फरवरी २०२० में ‘नमस्ते ट्रंप’ और सितंबर २०२३ में आयोजित जी-२० शिखर सम्मेलन के दौरान लगाए गए मीटरों लंबे हरे पर्दे भारत की जनता अभी भूली नहीं है। इस बार दक्षिण दिल्ली की कुली वैंâप जैसी बस्तियों को छिपा दिया गया। पर्दे का रंग भले बदल गया हो, लेकिन सत्ता का नजरिया और मंजर बिल्कुल नहीं बदला।
आर्थिक विषमता और साझेदारियों का असंतुलन
भारत ‘ब्रिक्स’ समूह को विकासशील देशों की आर्थिक आवाज के रूप में पेश करता आया है। लेकिन इस आर्थिक साझेदारी की कीमत भारत किस रूप में चुका रहा है, इस पर सत्ता की चुप्पी हैरान करने वाली है। सदस्य देशों के साथ भारत का व्यापार संतुलन बुरी तरह लड़खड़ाया हुआ है। जब आयात का आंकड़ा निर्यात के मुकाबले कई गुना अधिक हो जाए और व्यापार घाटा सवा दो सौ अरब डॉलर के पार पहुंच जाए, तो यह सोचने की जरूरत पड़ती है कि यह मंच भारत के लिए नए व्यापारिक रास्ते खोल रहा है या फिर देश को केवल एक विशाल खपत-बाजार बनाकर छोड़ दे रहा है। जिस साझेदारी में भारत की भूमिका मुख्यत: एक खरीदार की हो जाए, उसके आर्थिक लाभ पर आत्ममुग्ध होना कितना तर्कसंगत है? क्या भारत की सरहदों का लगातार अतिक्रमण करने वाले चीन पर अपनी आर्थिक निर्भरता बढ़ाते जाना भारत की दीर्घकालिक रणनीति के हित में हो सकता है?
सदस्य देशों के पारस्परिक हितों में टकराव
ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे विरोधी हितों वाले देश एक साथ इस मंच पर मौजूद हैं। इसलिए पश्चिम एशिया जैसे नाजुक संकट पर संयम और बातचीत की वही औपचारिक भाषा सामने आई, जिस पर अलग-अलग हितों वाले सभी देश किसी तरह सहमत हो सकें। ठीक यही स्थिति अंतर्रााष्ट्रीय व्यापार के लिए वैश्विक मुद्रा के विकल्प को लेकर भी दिखाई देती है। स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने की बातें लंबे समय से हो रही हैं, लेकिन अमेरिकी डॉलर की स्थापित वैश्विक व्यवस्था से बाहर निकलने का कोई ठोस और व्यावहारिक खाका इस सम्मेलन में भी सामने नहीं आ सका। स्पष्ट है कि मात्र नाम का बड़ा मंच अपने आपमें कोई बड़ी शक्ति नहीं होता।
अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर देश की उपस्थिति और तकनीकी, स्वास्थ्य या आपूर्ति-श्रृंखला जैसे क्षेत्रों में हुई साझेदारियां सकारात्मक हैं। लेकिन सच्चा हिसाब इस बात से होगा कि देश के निर्यात में कितनी वृद्धि हुई, हमारा व्यापार घाटा कितना कम हुआ, हमारी सीमाओं की सुरक्षा कितनी पुख्ता हुई, अंतर्राष्ट्रीय संकटों में हमारी कूटनीतिक आवाज कितनी प्रभावी हुई और देश के आम नागरिक के जीवन में कितना वास्तविक सुधार आया। छवि चमकाने के इरादे से जनता का पैसा खर्च करके बड़े-बड़े सम्मेलन आयोजित करना और राष्ट्रीय हितों को सचमुच हासिल कर लेना दो मुख्तलिफ बातें हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार-कवि-लेखक हैं।
