शीतल अवस्थी
-पितृपक्ष में सम्मानपूर्वक भोजन कराने की परंपरा; गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए पहले निकालें अन्न
पितृपक्ष में पूर्वजों की तृप्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण और दान के साथ ब्राह्मण भोजन का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि श्राद्ध के निमंत्रण पर आए योग्य ब्राह्मण के साथ पितर वायुरूप में उपस्थित होकर भोजन ग्रहण करते हैं। इसलिए उन्हें पूरी श्रद्धा, शुद्धता और सम्मान के साथ भोजन कराने की परंपरा है।
श्राद्ध शब्द भी ‘श्रद्धा’ से बना है। अतः केवल कर्मकांड पूरा करना पर्याप्त नहीं; भोजन कराने वाले व्यक्ति के मन में विनम्रता, कृतज्ञता और पूर्वजों के प्रति सच्चा सम्मान होना चाहिए।
पहले से दें निमंत्रण
श्राद्ध तिथि से एक दिन पहले योग्य और सदाचारी ब्राह्मण को विनम्रतापूर्वक भोजन के लिए आमंत्रित करें। भोजन के समय उन्हें दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठाने की परंपरा है, क्योंकि दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा माना जाता है।
यदि योग्य ब्राह्मण उपलब्ध न हो तो किसी जरूरतमंद, साधु, विद्यार्थी या भूखे व्यक्ति को भोजन कराया जा सकता है। मूल भावना पात्र व्यक्ति को सम्मानपूर्वक तृप्त करना है।
कैसा हो श्राद्ध का भोजन?
भोजन सात्त्विक, ताजा और स्वच्छ होना चाहिए। इसमें सामान्यतः खीर, पूड़ी, दाल, चावल, सब्जी, दूध, दही, घी, शहद और पितरों को पसंद रहे पकवान शामिल किए जाते हैं। परिवार एवं क्षेत्र की परंपरा के अनुसार भोजन में परिवर्तन हो सकता है।
भोजन बनाते समय क्रोध, विवाद और कटु वचन से बचना चाहिए। इसे केवल औपचारिक भोज न मानकर पूर्वजों के प्रति समर्पण के भाव से तैयार करें।
भोजन से पहले पंचबलि
ब्राह्मण को भोजन कराने से पहले तैयार भोजन में से पांच भाग निकालने की परंपरा है—
1. गाय के लिए
2. कुत्ते के लिए
3. कौए के लिए
4. देवताओं के लिए
5. चींटियों एवं छोटे जीवों के लिए
गाय, कुत्ते और कौए का हिस्सा उन्हें ही खिलाएं। स्थानीय परिस्थिति में देवता तथा चींटियों के लिए निकला भोजन गाय या अन्य जरूरतमंद जीवों को भी दिया जा सकता है। भोजन प्लास्टिक में रखकर न दें और स्वच्छता का ध्यान रखें।
संकल्प और भोजन
हाथ में जल, अक्षत, काले तिल, चंदन और पुष्प लेकर पूर्वजों के नाम से भोजन कराने का संकल्प करें। अतिथि को बिना जल्दबाजी पूरी तृप्ति से भोजन कराएं। भोजन के दौरान सम्मान बनाए रखें और किसी प्रकार का अपमान या भेदभाव न करें।
भोजन के बाद ब्राह्मण के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति अन्न, वस्त्र और दक्षिणा दें। उनसे परिवार की सुख-शांति के लिए आशीर्वाद लें तथा घर के द्वार तक सम्मानपूर्वक विदा करें। मान्यता है कि उनके साथ पितर भी विदा होते हैं।
ब्राह्मण अथवा अतिथि के भोजन के बाद ही परिवार के सदस्य भोजन ग्रहण करें। श्राद्ध का वास्तविक संदेश है—पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, अन्न का सम्मान और समाज के योग्य एवं जरूरतमंद व्यक्ति को आदरपूर्वक तृप्त करना।
