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संपादकीय : असंतोष के ढेर पर बैठा देश… मोदी बजा रहे हैं डफली!

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने भारतीय लोकतंत्र की पूरी तरह धज्जियां उड़ा दी हैं, इस संबंध में सत्यता से भरी एक रिपोर्ट `द इंडियन एक्सप्रेस’ ने प्रकाशित की है। वैसे तो लोगों को नियमों और कानून का पाठ पढ़ाने वाले, प्रवचन देने वाले और भाजपा विरोधियों पर डांट-फटकार लगाने वाले ज्ञानेश कुमार तब से मौन में चले गए हैं। उनकी वाणी चली गई है। गृह मंत्री अमित शाह भी गायब हैं। एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी डफली बजाते हुए दिखे, लेकिन इनमें से किसी ने भी भारतीय लोकतंत्र पर आए इस संकट के बारे में एक शब्द भी नहीं उच्चारित किया।‌ इस बीच केरल राज्य के पूर्व मुख्य सचिव जी.जी. थॉमस ने यह खुलासा किया है कि ज्ञानेश कुमार ने उनसे संपर्क करके केरल से लोकसभा चुनाव लड़ने का ऑफर दिया था। इतना ही नहीं, केंद्र में मंत्री बनाने का भी आश्वासन दिया गया था। यह मामला अत्यंत गंभीर है और ज्ञानेश कुमार संवैधानिक कुर्सी पर बैठकर भाजपा की दलाली कर रहे थे, प्रशासन के अधिकारियों पर भाजपा की मदद करने के लिए दबाव बना रहे थे तथा राजनीतिक प्रलोभन दिखा रहे थे। मुख्य चुनाव आयुक्त की इस निर्लज्ज कार्रवाई का भाजपा पुरजोर समर्थन कर रही है, यह और भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है। ज्ञानेश कुमार कैसे सही हैं और कांग्रेस शासनकाल के चुनाव आयुक्त कैसे अपराध करते थे, इसकी डफली बजाने का काम भाजपा प्रवक्ताओं ने शुरू कर दिया है। इसमें भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल हो चुके हैं। चुनाव आयोग एक स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था है। उस पर लगे
आरोपों का जवाब
वही देगा। भाजपा द्वारा चोरों का पक्ष लेकर लड़ना गंभीर बात है। ज्ञानेश कुमार देश के दुश्मन नंबर एक हैं। भारतीय लोकतंत्र को इस व्यक्ति ने अपने स्वार्थ के लिए सूली पर चढ़ा दिया और इसकी सजा उन्हें मिलनी ही चाहिए। गृह मंत्री अमित शाह के अधिकार क्षेत्र में काम करने वाला आयोग इससे अलग वैâसे व्यवहार कर सकता है? यह प्रश्न तो है ही। लेकिन जैसे ही `द इंडियन एक्सप्रेस’ ने ज्ञानेश कुमार का मुखौटा उतारा, जनता जाग उठी और मोदी-शाह के शासन के विरुद्ध जगह-जगह नारे लगाते हुए अपना आक्रोश व्यक्त करने लगी। मुंबई में मेट्रो, लोकल ट्रेन और प्लेटफार्मों पर `मोदी-शाह मुर्दाबाद’ के नारे शुरू हो चुके हैं। पिछले दो दिनों से `जंतर-मंतर’ पर रोजाना हजारों लोग एकत्र हो रहे हैं और कह रहे हैं कि देश की दूसरी स्वतंत्रता की लड़ाई में हमें भी उतरना है। इनमें से कई लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया है। `जंतर-मंतर’ परिसर को अमित शाह की सशस्त्र पुलिस ने घेर लिया है। अमित शाह जिस कृष्ण मेनन मार्ग पर रहते हैं, उस संपूर्ण परिसर की सैन्य छावनी के रूप में घेराबंदी कर दी गई है। यह डर ही इस सरकार की पराजय है। भारतीय जनता पार्टी के पतन की शुरुआत हो चुकी है, यही सच है। ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के लिए लोग सड़कों पर उतरेंगे और जो इस व्यक्ति को बचाने के लिए आगे आएंगे, उन्हें जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ेगा। नेपाल और बांग्लादेश में जो हुआ, उसी प्रकार का असंतोष और आक्रोश भारतीय जनता में दिखाई दे रहा है। जन-असंतोष के विस्फोटक ढेर पर मोदी-शाह की सरकार बैठी है और इन विस्फोटों को चिंगारी लगने की देर है, इनके
भ्रष्ट महल राख
हो जाएंगे। ज्ञानेश कुमार ने भाजपा को चुनाव जिताने के लिए पाप कर्मों की एक श्रृंखला ही निर्मित कर दी। उससे पहले राजीव कुमार नाम के जो चुनाव आयुक्त थे, वे भी यही कर रहे थे। मोदी-शाह ने इन सभी संस्थाओं को गुलाम बना लिया और लोकतंत्र तथा स्वतंत्रता की नीलामी कर दी। १३ करोड़ मतदाताओं को हटाना, यह २०२९ की विजय की नींव रखना था। पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और बिहार के विधानसभा चुनावों में इस प्रकार लाखों मतदाताओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया। गुजरात की व्यापारिक सोच वाले शासकों ने लोकतंत्र का इस तरह गला घोंटा है।
अब इन आरोपों का पीछा जनता ने शुरू कर दिया है। मतभेदों की सभी दीवारें ढहाकर विपक्षी दल एकजुट हो गए हैं। पश्चिम बंगाल में तो आश्चर्य ही घटित हो गया। ममता बनर्जी ने `वामपंथी’ दलों को लड़ाई में शामिल होने का निमंत्रण दिया। राहुल गांधी को ममता बनर्जी ने फोन करके कहा, `इंडिया गठबंधन की बैठक बुलाइए और आगे की लड़ाई की रणनीति तय कीजिए।’ यह एक शुभ संकेत है। भाजपा की तानाशाही और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की माफियागीरी के विरुद्ध देशभक्तों ने बिगुल फूंक दिया है। स्वतंत्र भारत की जनता ने पुन: स्वतंत्रता आंदोलन का शंखनाद करके `करो या मरो’ की लड़ाई में अपना झंडा फहरा दिया है। देश जाग चुका है। मोदी ने डफली बजाकर अपना अज्ञान प्रकट किया है। अमित शाह की बोलती बंद हो गई है। ज्ञानेश कुमार शांत हो गए हैं। देश बचाने की यह लड़ाई वैश्विक लोकतंत्र के लिए प्रेरणादायक साबित होगी।

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