मुख्यपृष्ठस्तंभतीर-ए-तौसीफ : जब सत्ता को आईना डराने लगता है

तीर-ए-तौसीफ : जब सत्ता को आईना डराने लगता है

-तौसीफ कुरैशी

सियासत में मौसम अचानक नहीं बदलता। पहले हवा का रुख बदलता है, फिर नारों की आवाज धीमी होती है और आखिरकार सत्ता को अहसास होता है कि जिस कहानी को वह देश की नियति समझ रही थी, जनता ने उसे अब कहानी मानना ही बंद कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी के सामने इन दिनों शायद यही सबसे बड़ी चुनौती है। उसका पारंपरिक सियासी दांव, हिंदू-मुसलमान का मुद्दा, नफरत और झूठ पर आधारित वह राजनीतिक विमर्श, जो लंबे समय तक चुनावी राजनीति का सबसे धारदार हथियार रहा, अब पहले जैसा प्रभाव पैदा करता नहीं दिखता।
इस बदलाव के संकेत २०२४ के लोकसभा चुनावों में ही मिलने लगे थे। उस समय जैसे-तैसे स्थिति को प्रबंधित कर लिया गया, लेकिन बाद में चुनावी नतीजों पर उठे सवालों ने उस बेचैनी को ढंकने का काम जरूर किया, मगर खत्म नहीं किया। सत्ता पक्ष ने राहत की सांस भले ली, लेकिन मूल प्रश्न ज्यों के त्यों बने रहे।
नफरत का सारथी और संसद से दूरी
इसके बाद भाजपा ने नए प्रयोग शुरू किए। असली खेल जुलाई के बाद स्पष्ट होने लगा। कभी सीना ठोककर यह कहने वाली सत्ता कि ‘एक अकेला सब पर भारी है’, जब संसद का सामना करने से बचती दिखी और पिछले दरवाजे से हटती नजर आई, तो राजनीति में एक नया सवाल खड़ा हो गया, आखिर संसद से इतनी दूरी क्यों? क्या नफरत की इस विचारधारा के पास तर्कों के आधार पर संवाद करने की क्षमता नहीं बची या फिर अपनी अनुपस्थिति को सही ठहराने के लिए नफरत के सारथी तर्कों की फौज लेकर मैदान में उतरे हैं?
इस दौरान ‘गोदी मीडिया’ ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई और लेखन-पठन से जुड़े एक वर्ग ने भी ढाल बनने का प्रयास किया। यह माहौल बनाया गया कि यदि सत्ता संसद में आई तो क्या-क्या होगा, विपक्ष का रुख वैâसा रहेगा और माहौल कितना असहज होगा। मगर सवाल सीधा था, यदि लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच ही असुविधाजनक लगने लगे, तो फिर ५६ इंच के सीने का क्या औचित्य? गलत को तर्कों की भीड़ से सही सिद्ध नहीं किया जा सकता। झूठ को बार-बार दोहराने से वह सच नहीं बन जाता; एक न एक दिन सच का सामना करना ही पड़ता है।
परिसीमन, उत्तर-दक्षिण और क्षेत्रीय राजनीति
इसके बाद परिसीमन का मुद्दा सामने आया। हालांकि, परिसीमन को लेकर आंकड़ों की व्यवस्था कर ली गई थी; कुछ राजनीतिक जोड़-तोड़ के जरिए उन दलों से सहमति बना ली गई जो नाम मात्र के दल हैं, लेकिन मूलत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा की प्रॉक्सी के रूप में काम करते हैं। यहां तक कि सपा जैसी पार्टियों से भी राजनीतिक समझौते की चर्चाएं हुईं। (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सदन में कहा भी था कि अखिलेश यादव हमारे बहुत अच्छे मित्र हैं और समय-समय पर काम आ जाते हैं।)
लेकिन दक्षिण बनाम उत्तर भारत, राज्यों के उचित प्रतिनिधित्व, लोकसभा सीटों के आवंटन और लोकतांत्रिक हिस्सेदारी के प्रश्नों ने वह बहस छेड़ दी, जिसमें ‘हिंदू-मुसलमान’ का नारा अकेला पड़ता दिखाई दिया। जनता के सामने पहली बार यह सवाल स्पष्ट होकर उभरा कि भविष्य की संसद में किसकी कितनी आवाज होगी।
चुनाव आयोग पर सवाल और महाभियोग की आहट
इसी बीच चुनाव आयोग से जुड़ा विवाद सतह पर आ गया। मतदाता सूची, एसआईआर प्रक्रिया और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर विपक्ष के आरोपों ने इस बहस को और गहरा कर दिया। जननायक के संघर्षों से जनता के मन में यह आशंका सच बनकर बैठने लगी और अब वह एक बड़े राजनीतिक मुद्दे का रूप ले चुकी है। चुनाव आयोग ने अपने ऊपर लगे आरोपों और आंतरिक मतभेदों पर स्पष्टीकरण देते हुए उन्हें खारिज किया है, उसे संस्थागत रूप से यही करना भी था, लेकिन यह स्पष्टीकरण जनता को पूरी तरह आश्वस्त नहीं कर सका।
अब विपक्ष और जननायक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे हैं। यह प्रस्ताव पारित होगा या नहीं, यह तो संसदीय संख्याबल तय करेगा। लेकिन इस दौरान वे दल भी सवालों के घेरे में आएंगे जो सत्ता पक्ष के साथ खड़े होंगे। जनता उनसे सवाल पूछेगी कि जब लोकतंत्र और वोट की शुचिता से जुड़े प्रस्ताव आए थे, तब वे किसके साथ खड़े थे? संभव है कि प्रस्ताव गिर जाए (क्योंकि अंतरात्मा की आवाज पर वोट करने की उम्मीद कम ही होती है), लेकिन राजनीति में हर प्रस्ताव का महत्व उसके अंतिम परिणाम से ही तय नहीं होता। कभी-कभी प्रस्ताव गिर जाता है, मगर सवाल इतिहास में दर्ज हो जाता है।
भावनाओं पर भारी पड़ता संविधान
भाजपा के लिए असली चिंता यही है। एक तरफ परिसीमन का सवाल है, जिसमें उत्तर बनाम दक्षिण, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और भविष्य की संसद का ढांचा शामिल है। दूसरी तरफ चुनावी निष्पक्षता, मतदाता सूची और मताधिकार की सुरक्षा का मुद्दा है।
अर्थात अब बहस केवल मंदिर-मस्जिद के इर्द-गिर्द सीमित नहीं रही। अब सवाल यह है कि लोकतंत्र में वोट की असली ताकत किसकी है, उसकी गिनती निष्पक्ष कौन करेगा और संसद में किसकी कितनी भागीदारी होगी। सत्ता के लिए इससे कठिन विमर्श कोई दूसरा नहीं हो सकता, क्योंकि यहां केवल भावनाओं का सहारा नहीं लिया जा सकता, यहां संविधान बोलता है।
नफरत के बाजार की भी एक निश्चित सीमा होती है। यदि ग्राहक रोज़ एक ही सामान खरीदना बंद कर दे, तो दुकानदार को एक न एक दिन हिसाब लगाना ही पड़ता है कि आखिर दुकान क्यों नहीं चल रही। भाजपा के सामने भी आज यही स्थिति है। कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है; चुनाव अभी दूर हैं और जनता का निर्णय भविष्य के गर्भ में है। लेकिन यह स्पष्ट दिख रहा है कि जिस विमर्श के भरोसे राजनीति लंबे समय तक चलाई गई, उसके सामने अब गंभीर प्रश्न खड़े हैं। लोकतंत्र की यही विशेषता है, सत्ता चाहे कितनी भी शक्तिशाली हो, नागरिक का सवाल उससे बड़ा हो सकता है। सत्ता सवाल को कुछ समय के लिए दबा तो सकती है, लेकिन उसे हमेशा के लिए खत्म नहीं कर सकती।
हर-हर… घर-घर… लाजिम है कि हम भी देखेंगे।
सत्यमेव जयते।

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