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सीधी बात: आम भक्त कतार में, वीआईपी डायरेक्ट गर्भगृह में, भगवान के घर भी ‘प्रीमियम सर्विस’!

सुरेश गोलानी

‘ईश्वर की नजर में सब एक समान हैं’- यही भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का मूल सिद्धांत माना जाता है। मंदिर वह पवित्र स्थान है जहां राजा और रंक, अमीर और गरीब, सब अपनी सामाजिक पहचान और अहंकार को बाहर छोड़कर एक साधारण भक्त के रूप में प्रवेश करते हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से ‘विशेष दर्शन’, ‘शीघ्र दर्शन’, ‘सशुल्क दर्शन’ और ‘वीआईपी पास’ जैसी व्यवस्थाओं ने भगवान के दरबार को भी श्रेणियों में विभाजित कर दिया है। एक ओर जहां आम श्रद्धालु घंटों और कभी-कभी पूरे दिन लंबी कतारों में खड़े रहकर अपने आराध्य की एक झलक पाने का इंतजार करते हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ विशेष लोग पैसे या रसूख के बल पर कुछ ही मिनटों में सीधे गर्भगृह तक पहुंच जाते हैं।
ईश्वर के दरबार में पैदा हुई यह असमानता आस्था के मूल सिद्धांतों पर गंभीर सवाल खड़ी करती है। मंदिर-मंडल प्रशासनों का तर्क होता है कि विशिष्ट अतिथियों, बुजुर्गों, बीमार लोगों या सुरक्षा खतरों वाले राजनेताओं और सेलिब्रिटी के लिए अलग व्यवस्था करना सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के लिए जरूरी हो जाता है। दूसरी तरफ टिकटों से मिलने वाले धन का उपयोग मंदिर के रख-रखाव, बुनियादी ढांचे के विकास, लंगर और सामाजिक कार्यों के लिए किया जाता है।
जब एक गरीब श्रद्धालु कतार में धक्का खाता है और एक वीआईपी व्यक्ति को आराम से आगे निकलते देखता है, तो उसकी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचना स्वाभाविक है। ऐसा लगता है मानो भगवान के दर्शन भी अब एक ‘प्रीमियम सेवा’ बन चुके हैं, जिसे खरीदा जा सकता है।
जानकारों का कहना है कि मंदिरों में लगने वाली अंतहीन कतारों और भेदभाव का सबसे बेहतरीन समाधान है कि वीआईपी दर्शन के लिए एक बहुत ही सीमित समय तय होना चाहिए, ताकि आम भक्तों की कतारों में व्यवधान न आए, इसके अलावा कई अन्य प्रमुख देवस्थानों की तर्ज पर किफायती दरों पर ऑनलाइन स्लॉट बुकिंग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिससे किसी को भी कतार में घंटों न खड़ा होना पड़े। इसके अलावा गर्भगृह के भीतर भगवान की मूर्ति के सामने खड़े होने का अधिकार और समय सभी के लिए बराबर होना चाहिए, चाहे वह वीआईपी हो या आम नागरिक।

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