-२६५ तालुकों में राहत की कोशिशें तेज
-बैंकों को घर जाकर वसूली से रोका
-शहरों में १० प्रतिशत पानी कटौती पर विचार
-पशुचारे और दूध-अंडे की कीमतों पर भी खतरा
सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र में सूखे का संकट अब केवल खेतों तक सीमित नहीं रहा। राज्य की सूखा वैâबिनेट उपसमिति ने बैंकों को निर्देश दिया है कि फसल ऋण वसूली के लिए कर्मचारी किसानों के घर जाकर दबाव न बनाएं। यह पैâसला २६५ सूखाग्रस्त तालुकों के लाखों किसानों को तत्काल राहत देने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है, लेकिन दूसरी तरफ संकट गहराता जा रहा है। पशुओं के लिए पानी और चारे की कमी बढ़ने से किसानों की मजबूरी में पशुधन बिक्री की खबरें सामने आ रही हैं। इससे आने वाले महीनों में डेयरी, पोल्ट्री, दूध और अंडे की लागत पर दबाव बढ़ सकता है।
मुंबई में सात झीलें करीब ९७ प्रतिशत भरी होने के बावजूद १० प्रतिशत पानी कटौती जारी है। शहर की रोजाना मांग करीब ४,२०० एमएलडी है, जबकि आपूर्ति करीब ३,८५० एमएलडी। बीएमसी अब पुराने कुओं और बोरवेल को साफ कर भूजल को पूरक स्रोत बनाने की तैयारी में है। राज्य सरकार अन्य शहरों में भी १० प्रतिशत पानी कटौती और गंभीर संकट वाले इलाकों में निर्माण कार्यों पर पाबंदी जैसे उपायों पर विचार कर रही है। ये कदम अभी प्रस्तावित हैं, लागू आदेश नहीं। साथ ही सरकार ६,७२८ करोड़ रोजगार गारंटी कार्यक्रम में लगाने की योजना बना रही है। सूखे से राहत के उपाय कागज पर तेज हैं, लेकिन पानी, चारा और आय, तीनों मोर्चों पर किसान और शहर कितने सुरक्षित हैं?
किसानों पर वसूली का दबाव थमेगा
सूखा प्रभावित २६५ तालुकों के किसानों को राहत देने के लिए सूखा वैâबिनेट उपसमिति ने बैंकों को निर्देश दिया है कि फसल ऋण वसूली के लिए कर्मचारी किसानों के घर जाकर दबाव न बनाएं। पशुओं के लिए पानी और चारे की कमी के बीच पशुधन बेचने की मजबूरी से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर संकट बढ़ने की आशंका है।
