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ज्ञानू का इस्तीफा नहीं तो नरू का होगा!..‘कॉकरोच’ समझा था, कारवां बना दिया!

-रोजगार और पेपर लीक से शुरू हुआ युवा गुस्सा चुनाव आयोग तक पहुंचा
-व्यंग्य बना जेन-जी का राजनीतिक हथियार
-पोस्टर, नारों और सोशल मीडिया से सीधा प्रहार
-बड़े दलों के झंडों के बिना युवाओं का शक्ति प्रदर्शन
-मुंबई से राष्ट्रीय आंदोलन बनाने की तैयारी

फिरोज खान / मुंबई

जिस ‘कॉकरोच’ शब्द को युवाओं का उपहास बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया, उसी शब्द को जेन-ज़ी ने अब प्रतिरोध का हथियार बना लिया है। शुक्रवार को शिवाजी पार्क की सड़कों पर उमड़ी भीड़ ने दिखा दिया कि युवाओं का गुस्सा अब सोशल मीडिया की स्क्रीन तक सीमित रहने वाला नहीं है। कल शिवाजी पार्क पर ‘ज्ञानू का इस्तीफा नहीं तो नरू का होगा’ नारा इसी की बानगी बना।
कॉकरोच जनता पार्टी ने रोजगार, पेपर लीक और परीक्षाओं में गड़बड़ी के सवालों से अपनी पहचान बनाई थी। अब वही आंदोलन मतदाता सूची, एसआईआर और चुनाव आयोग की जवाबदेही तक पहुंच गया है। प्रदर्शन में युवा किसी पारंपरिक राजनीतिक जुलूस की तरह नहीं आए। उनके हाथों में व्यंग्यात्मक पोस्टर, तख्तियां और वोट के अधिकार से जुड़े सवाल थे।
मैदान बंद हुआ तो सड़क बनी आंदोलन का मंच
प्रशासन ने शिवाजी पार्क में प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी, लेकिन यही रोक आंदोलन के लिए र्इंधन बन गई। मैदान बंद हुआ तो युवा सड़क पर बैठ गए। गिरफ्तारी की चेतावनी मिली तो ‘जेल भरो’ का नारा और तेज हो गया।
नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी और विशाल ददलानी जैसे चर्चित चेहरों के पहुंचने से आंदोलन की गूंज और दूर तक गई। आंदोलनकारियों का कहना था कि यह किसी एक राजनीतिक दल को बचाने या जिताने की लड़ाई नहीं, बल्कि वोट के अधिकार को बचाने का संघर्ष है। शिवाजी पार्क से निकला संदेश सीधा था जिस युवा को सत्ता ने हल्के में लिया, वही अब सरकार और संवैधानिक संस्थाओं से जवाब मांगने सड़क पर उतर चुका है।
अनुमति नहीं मिली तो सड़क को बना लिया मैदान
मुंबई पुलिस ने शिवाजी पार्क में सीजेपी के प्रदर्शन को अनुमति नहीं दी थी। इसके बावजूद शुक्रवार शाम चार बजे से युवाओं, छात्रों और नागरिकों का वहां पहुंचना शुरू हो गया। प्रदर्शनकारियों को मैदान में प्रवेश नहीं मिला तो उन्होंने बाहर सड़क पर ही धरना शुरू कर दिया। कुछ ही देर में शिवाजी पार्क से मुख्य सड़क तक हाथों में बैनर और पोस्टर लिए आंदोलनकारी दिखाई देने लगे। कार्रवाई और गिरफ्तारी की आशंका भी युवाओं को रोक नहीं सकी। उनका कहना था कि संविधान ने विरोध का अधिकार दिया है और वे इस अधिकार का इस्तेमाल करके रहेंगे। मैदान बंद करने की प्रशासनिक रणनीति उलटी पड़ी और पूरी सड़क ही आंदोलन का मंच बन गई।

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