संजय दत्त ‘शेखर टुनाइट’ में मुन्नाभाई वाले अंदाज में आए और कह गए कि भारत में पहले जैसी शांति महसूस नहीं होती। बात सोशल मीडिया पर पहुंची तो शांति के बजाय हंगामा मिल गया। किसी ने समर्थन किया, किसी ने ट्रोल किया और किसी ने दुबई से जुड़े सवाल उठा दिए। फिर संजय दत्त ने एक्स पर सफाई दी, किसी व्यक्ति, समुदाय या संस्था की भावना को ठेस पहुंचाना उनका मकसद नहीं था। बातचीत लिखी हुई, हल्की-फुल्की और हास्यपूर्ण थी। भावना गांधीगिरी वाली थी, प्यार, अपनापन, एकता और सद्भावना। अब समस्या यह है कि संवाद स्क्रिप्टेड था, लेकिन प्रतिक्रिया मौलिक निकली। अभिनेता ने शांति की चिंता जताई, दर्शकों ने बयान का पोस्टमार्टम शुरू कर दिया और अंत में मुन्नाभाई को बताना पड़ा कि डायलॉग को गंभीरता से नहीं, संदर्भ से पकड़िए। हमारे सार्वजनिक जीवन में सफाई फिल्मी बीमा बन चुकी है। बयान चल गया तो विचार; विवाद हुआ तो व्यंग्य; विरोध हुआ तो संदर्भ से बाहर! संजय दत्त ने देश या लोगों का अपमान नहीं किया था। उन्होंने चिंता जताई थी, जिसे स्वीकार या अस्वीकार किया जा सकता है। मगर इंटरनेट अदालत में आधा वाक्य ही पूरा आरोपपत्र बन जाता है। बोले तो… शांति पर बात करने निकले थे, भाई; सोशल मीडिया ने ऐसा शोर मचाया कि आखिर कहना पड़ा, मामू, वह सीन स्क्रिप्टेड था!
