मुख्यपृष्ठस्तंभतीर-ए-तौसीफ : दरकते आभामंडल की दरारें और सत्ता की बेचैनी

तीर-ए-तौसीफ : दरकते आभामंडल की दरारें और सत्ता की बेचैनी

-तौसीफ कुरैशी

जब किसी नफरती या निरंकुश सत्ता का प्रभाव (आभामंडल) कमजोर पड़ने लगता है तो उसकी दरारों से सबसे पहले रोशनी नहीं, बल्कि सत्ता की बेचैनी बाहर आती है। यही बेचैनी धीरे-धीरे उस रोशनी में बदल जाती है जो वर्षों से अंधेरे में दबाए गए कड़वे सच को उजागर करने लगती है। इंडियन एक्सप्रेस द्वारा चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों पर की गई हालिया पड़ताल इसी का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
अक्सर देखा गया है कि जब सत्ता की पकड़ ढीली होती है तो मीडिया और कलम की रीढ़ स्वत: सीधी होने लगती है। पिछले कुछ समय से कुछ मीडिया समूहों के सुर में आया बदलाव इसी की ओर इशारा करता है। राजनीतिक गलियारों में इस बदलाव के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संकेतों के कयास भी लगाए जा रहे हैं। हालांकि, यह किसी सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है या कोई स्वतंत्र प्रयास- यह अभी केवल एक अनुमान है। संघ पर लगनेवाले आरोपों और नफरत की बुनियाद से जुड़े सवालों के बीच, मुख्य मुद्दा यह है कि संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। चुनाव आयोग द्वारा अपने फैसलों को सर्वसम्मत बताना यह साबित करता है कि मामला केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे लोकतंत्र और संवैधानिक पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है।
पत्रकारिता का बदलता रुख और सत्ता का समीकरण
हाल के दिनों में टेलीविजन चैनलों और मुख्यधारा के मीडिया के तेवर भी बदले-बदले नजर आ रहे हैं। जो सवाल कल तक सत्ता के ऊंचे दरवाजों के सामने दम तोड़ देते थे, वे अब प्राइम टाइम बहस का हिस्सा बन रहे हैं। यहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर पत्रकारिता की ‘बहादुरी’ सत्ता के प्रभाव और ताकत के अनुपात में ही क्यों घटती-बढ़ती है?
क्या वाकई अरबों रुपये और सालों की मेहनत से निर्मित राजनीतिक आभामंडल अब दरक रहा है? या फिर सत्ता के अंदरूनी समीकरणों में आए बदलावों ने उन आवाजों को बाहर आने का मौका दिया है, जो वर्षों से खामोश थीं? इन तमाम सवालों के जवाब भले ही आने वाला वक्त देगा, लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता की निरंकुशता बढ़ती है और पत्रकारिता चुप रहती है तो लोकतंत्र को सबसे अधिक नुकसान पहुंचता है। आज मीडिया के एक वर्ग द्वारा सवाल उठाने की मजबूरी केवल उनका साहस नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर जनता (विशेषकर जेन-जी) के बीच खोती साख और लोकतंत्र में जवाबदेही की बढ़ती मांग का नतीजा है।
१२ बरस का सन्नाटा
सत्ता और पत्रकारिता के इस रिश्ते को समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना जरूरी है। १९७५ की इमरजेंसी के दौरान जब समाचार पत्रों पर कड़ी सेंसरशिप थोपी गई, तब कुछ पत्रकारिता घुटनों के बल आ गई तो कुछ ने डटकर प्रतिरोध किया। लेकिन १९७७ में जब तानाशाही का अंधेरा छंटा तो पत्रकारिता ने अपनी उसी चुप्पी और सत्ता दोनों को करारा जवाब दिया।
मौजूदा दौर में स्थिति और भी जटिल रही है, जहां पत्रकारिता लगभग बारह वर्षों की लंबी ‘वैâद’ और खामोशी से गुजरी है। इतने लंबे समय में सत्ता के सुर में सुर मिलाना ही ‘राष्ट्रवाद’ की परिभाषा बन गया था और निष्पक्ष सवाल पूछने वाले को ‘राष्ट्रविरोधी’ करार देने की प्रवृत्ति ने जन-विमर्श को पूरी तरह दूषित कर दिया था। इतने सालों के बाद यदि मीडिया के कुछ वर्ग फिर से सवाल पूछने का दुस्साहस कर रहे हैं तो यह लोकतंत्र के लिए एक राहत की सांस की तरह है, जिसने यह सिद्ध कर दिया है कि सत्ता का अंधेरा अब निर्विवाद नहीं रहा।
लोकतंत्र की उम्मीद
हालांकि, पत्रकारिता की असली परीक्षा अभी खत्म नहीं हुई है, बल्कि अब शुरू हुई है। गोदी मीडिया या अचानक जगे पत्रकारों को केवल किसी एक अधिकारी या एक संस्था तक सीमित नहीं रहना होगा। उन्हें सत्ता के हर उस केंद्र और व्यवस्था से निर्भीकता से सवाल करने होंगे, जहां आम नागरिकों के मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं। चाहे दिल्ली हो, महाराष्ट्र, बंगाल, बिहार, हरियाणा या मध्य प्रदेश- हर चुनावी सवाल और संवैधानिक गड़बड़ी की पड़ताल पूरी गंभीरता से करनी होगी।
पत्रकारिता का असली मानदंड यह देखना भी होगा कि यदि कल सत्ता बदल जाती है तो क्या मीडिया का विवेक और साहस फिर से छुट्टी पर चला जाएगा? पत्रकारिता किसी सरकार या सत्ता की कृपा से बहादुर नहीं बनती। उसका वास्तविक पैमाना यही है कि वह हर हाल में सबसे शक्तिशाली व्यक्ति के सामने खड़े होकर नागरिक के हित में तीखे सवाल रख सके। सत्ता का आभामंडल कभी भी स्थायी नहीं होता, लेकिन सच की रोशनी को हमेशा बनाए रखना ही निष्पक्ष पत्रकारिता का मुख्य धर्म है। जैसा कि इतिहास हमेशा दोहराता है-आभामंडल की इन दरारों के बीच उम्मीद ही लोकतंत्र की असली ताकत है।
सत्यमेव जयते
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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