टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के सर्वेक्षण के अनुसार, राष्ट्रीय शिक्षा नीति – २०२० के लागू होने के बाद वर्ष २०२१-२२ से २०२४-२५ के बीच स्कूली विद्यार्थियों की नामांकन संख्या में लगभग ३.२५ करोड़ (२६.५ करोड़ से घटकर २३.२ करोड़) की चिंताजनक गिरावट दर्ज की गई है। यह आंकड़ा ‘पढ़े भारत, बढ़े भारत’ जैसे सरकारी अभियानों के जमीनी प्रभाव पर एक बड़ा नीतिगत प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
शिक्षकों की भारी कमी और बहु-कक्षा शिक्षण
टीआईएसएस के सर्वेक्षण से स्पष्ट होता है कि देशभर में गणित और विज्ञान जैसे बुनियादी विषयों के अध्यापकों की भारी कमी है। कई राज्यों में एक ही शिक्षक को कई कक्षाओं को एक साथ पढ़ाने पर मजबूर होना पड़ रहा है। जब मूलभूत विषयों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षण उपलब्ध नहीं होता, तो बच्चे सीखने के बुनियादी स्तर पर पिछड़ जाते हैं और अंतत: स्कूल छोड़ देते हैं।
‘लर्निंग लॉस’ और बुनियादी दक्षताओं का अभाव
अध्ययन यह दर्शाते हैं कि बच्चों के सीखने के स्तर और बुनियादी ज्ञान क्षमता में गिरावट आई है। एनईपी के तहत पेश किए गए नए ढांचे के अनुरूप जब बच्चे अगली कक्षाओं में पदोन्नत होते हैं, लेकिन उनका वैचारिक आधार कमजोर रहता है, तो वे पढ़ाई के बढ़ते बोझ के कारण व्यवस्था से बाहर होने लगते हैं।
सामाजिक-आर्थिक कारक और डेटा प्रबंधन
आधार से लिंक करने और ‘UDISE+’ डेटा सफाई की प्रक्रियाओं के चलते कई कागजी या फर्जी नामांकन खारिज हुए हैं, लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के उन बच्चों का भी है जो आजीविका के दबाव, पलायन या डिजिटल पहुंच की कमी के कारण औपचारिक स्कूली प्रणाली से कट गए।
बुनियादी ढांचे और संसाधन आवंटन का संकट
नीतिगत घोषणाओं के बावजूद जीडीपी का अपेक्षित प्रतिशत (६ प्रतिशत) शिक्षा पर खर्च न होना, सरकारी प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों में सुविधाओं और बुनियादी ढांचे का अभाव बनाए हुए है। निजीकरण के बढ़ते प्रभाव से गरीब और वंचित वर्गों के लिए शिक्षा लगातार महंगी और पहुंच से बाहर होती जा रही है।
सच्चाई तो यह है कि केवल नीतियां और बड़े नारे गढ़ने से शिक्षा प्रणाली में सुधार नहीं होता। जब तक जमीनी स्तर पर शिक्षकों की पारदर्शी भर्तियां नहीं होंगी, गणित-विज्ञान जैसे विषयों में योग्य शिक्षक उपलब्ध नहीं कराए जाएंगे और ड्रॉपआउट हो रहे बच्चों के लिए लक्षित ‘रिटेंशन रणनीतियां नहीं बनाई जाएंगी, तब तक ‘पढ़े भारत, बढ़े भारत’ का लक्ष्य कागजों तक ही सीमित रहेगा।
