मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य :  टेबल से टेबल तक

अवधी व्यंग्य :  टेबल से टेबल तक

एड. राजीव मिश्र, मुंबई

सरकारी दफ्तर मा काम करवावै बिना अदमी के पहिले ई मान के चलै कि चाही कि काम कब होई यहिका कउनउ गारंटी नही है। काहे कि सरकारी दफ्तर मा काम से ज्यादा जरूरी होत है, काम कहां से शुरू होत है, ई पता लगावै का खेल। रामखेलावन अपने पिताजी के नाम सुधरवावै खातिर सरकारी बैंक पहुँचे। काउंटर पे बइठे बाबूजी से कहिन, ‘बाबू साहेब, ई हमरे खाता मा हमरे पिताजी के नाम में गलती है। यहिका सुधार दिहा जाय।’ बाबूजी कागज देखिकै बोले, ‘उ सब तो ठीक है पर ई काम हमरे टेबल पे नहीं होत है। अइसा आप दुइ नंबर टेबल पर जाओ’। रामखेलावन दुइ नंबर वाली टेबल पहुँचे। बाबू कागज उलट-पलट के बोले, ‘अरे ! इहां कहां आइ गयो भइया? एक काम करो, पांच नंबर टेबल पर जाओ उहां शर्मा जी बइठे हैं ई उनका काम है।’ हारिके रामखेलावन पांच नंबर पे पहुंचे तो शर्मा जी, कागज के बिना हाथ लगाए बोले, का है? अरे कागज देखो, एप्लिकेशन देखो तब पता चली न का है। तो तुम बताई देइहौ तो का होइ जाई, तुम्हारे मुंह मा दही जमा अहइ का? तो तुम्हरा हाथ मा लकवा मारी गवा है। तीन घंटा मा रामखेलावन कुलि नौ टेबल घूमि चुके अउर दसवीं बार फिर से एक नंबर टेबल पर पहुंचे त बाबूजी मुस्कुराय के बोले, ‘अरे, तुम फिरि से काहें आई गयो?’ रामखेलावन हाथ जोड़िकै बोले, ‘का करीं बाबू साहेब! आप लोगन का आदेश मानत-मानत अब हमार चक्कर पूरा होइ गवा, बस अब प्रसाद चढ़ाय के घर जाइब।’ बाबूजी गंभीर होइके बोले, ‘अइसा है रामखेलावन, सरकारी काम मा धीरज बहुतै जरूरी है।’ रामखेलावन बोले- ‘धीरज त हम धर लिएन बाबू साहेब, अब पैरन मा तेल धरवावै का जरूरत पड़त है।’ बगल मा बैठा चपरासी धीरे से बोला, ‘बाबूजी, इनका काम कई दिहा जाय, बेचारू सुबह से घूमत है।’ बाबूजी फाइल बंद करत बोले, ‘अरे भाई, नियम-कायदा भी कउनउ चीज होत है, पहिले साहब के साइन होई फिरि बड़े बाबू के होइ तब जाइके कहीं हमरा नंबर आयी ’ रामखेलावन पूछिन – ‘साहब कहाँ मिलिहैं?’ बाबूजी बोले – ‘दूसरी मंजिल पर।’ जइसनय रामखेलावन सीढ़ी की ओर बढ़े पीछे से चपरासी आवाज लगाइस, पहिली बार आयो है का सरकारी दफ्तर मा?’ रामखेलावन वापस मुड़े अउ बोले – हां साहेब। चपरासी मुस्कुराइ के बोलिस, एक काम करो हमरे पीछे पीछे आओ कहिके ’थोड़ी देर चले के बाद रामखेलावन से बोलिस, एक काम करो निकारो सौ रुपिया, अबहियें पांच मिनट में काम कराय देईथ !’ मरता का न करता, आखिर मा रामखेलावन सौ रुपिया अंटी से ढीला किहिन तब जाइके उनके बाप के नाम में सुधार होइ पावा।

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