एम एम एस
भोपाल के रानी कमलापति स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर एक पर दो भैंसें टहलती दिखीं; उसी दिन रेलवे महाप्रबंधक का निरीक्षण भी था। स्टेशन को ४५० करोड़ रुपये की लागत से विकसित किया गया है और वहां १६० वैâमरों से निगरानी का दावा है। शुरुआती खबरों में आरपीएफ थाने का खुला गेट वजह बताया गया; रेलवे के बयान के मुताबिक, मवेशी ट्रैक क्षेत्र से प्लेटफॉर्म पर आए और करीब तीन मिनट में हटा दिए गए। काय भिया, यात्रियों को टिकट दिखाकर प्लेटफॉर्म पर आना पड़ता है; भैंसों ने शायद सुरक्षा जांच से सीधा वीआईपी प्रवेश पा लिया! शताब्दी के सामने उनकी चहलकदमी देखकर मुसाफिर रास्ता बदलते रहे; भैंसों को न ट्रेन छूटने की चिंता, न प्लेटफॉर्म टिकट की। रेलवे ने जगहों को बंद करने और निगरानी मजबूत करने की बात कही है। अच्छा है; वरना अगली बार निरीक्षण दल को स्टेशन की व्यवस्था के साथ गोबर प्रबंधन भी जांचना पड़ेगा। एयरपोर्ट जैसी सुविधा का दावा तब ही जमेगा, जब प्लेटफॉर्म पर यात्रियों के अलावा कोई भी बिना रोकटोक न घूमे। फिलहाल भैंसें तीन मिनट में बाहर हुर्इं; सुरक्षा की परीक्षा अभी बाकी है।
काबर भइया, पानी बंद तो बर्तन टॉयलेट में?
कोरबा के निहारिका इलाके की मिठाई दुकान का वीडियो वायरल हुआ; उसमें एक कर्मचारी बाथरूम के फर्श पर बड़े बर्तन धोता दिखा। संचालक ने खाद्य विभाग को पानी की आपूर्ति बाधित होने की वजह बताई। निरीक्षण के बाद विभाग ने दुकान को सुधार के निर्देश और नोटिस दिया; तय समय में स्वच्छता संबंधी कमियां दूर न हुर्इं तो लाइसेंस निलंबित हो सकता है।
काबर भइया, पानी की लाइन बंद हुई तो बर्तनों को टॉयलेट की फर्श पर उतारना कौन-सा जुगाड़ निकला? मिठाई की दुकान में पानी जरूरी है; पर सफाई का मतलब बस पानी डाल देना नहीं होता। आपात स्थिति में भी खाने-पीने के बर्तनों के लिए साफ जगह और सुरक्षित इंतजाम चाहिए; नहीं तो ग्राहक रसगुल्ले से पहले व्यवस्था का जायका पूछेगा। खाद्य विभाग ने नोटिस देकर सुधार का मौका दिया है; आगे दुकान की सफाई और जवाबदेही पर नजर रहेगी। इहां ‘पानी नहीं था’ वजह हो सकती है; नियमों से छुट्टी का परवाना नहीं। दुकान को व्यवस्था दुरुस्त करनी होगी; ग्राहक को भरोसा चाहिए कि मिठाई रसोई में बनी है, बाथरूम की फर्श पर नहीं। काबर, साफ-सफाई में इतना ढील काबर?
ओले रोकने वाली तोप पर रोक; अब बागवान अदालत की छतरी तले!
हिमाचल हाई कोर्ट ने शिमला जिले के जुब्बल-कोटखाई क्षेत्र में देवड़ीघाट और बरेओंघाट की दो एंटी-हेलगन कम-से-कम एक साल तक चलाने पर रोक लगाई है। मामला आसपास के बागों पर संभावित असर को लेकर दायर याचिका से जुड़ा है। अदालत ने वैज्ञानिक अध्ययन पूरा होने तक मशीनें बंद रखने को कहा; अध्ययन को अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने में अभी कई साल लग सकते हैं। बागवानों ने चिंता जताई कि ओले रोकनेवाली तोप का असर पड़ोसी बागों पर पड़ सकता है। अब अदालत ने कहा, फिलहाल तोप चुप रहे; विज्ञान अपनी जांच पूरी करे। पहाड़ में मौसम का मिजाज पहले ही अपने हिसाब से चलता है; ऊपर से तोप चले तो बादल भी पूछें, ‘किधर जाना है?’ मशीनें एक साल तक बंद रहेंगी, अध्ययन को और समय चाहिए। यानी बागवानों को इस बीच ओलों से भी जूझना है और नतीजे का इंतजार भी करना है। विज्ञान का पैâसला आने तक अदालत ने तोप पर ताला लगा दिया; अब बागवानों की निगाह बादलों पर और सरकार की निगाह रिपोर्ट पर। बागों की रखवाली फिलहाल अदालत के आदेश से है; प्रकृति को आदेश कौन देगा?
१५ साल का काम ५ घंटे में… इसे कहते हैं ‘जनता का पावर’!
उधर, छत्तीसगढ़ के एक गांव में गजबे खेल हो गया! नाले पर एक छोटी सी पुलिया के लिए बेचारी जनता १५ सालों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर अपनी चप्पलें घिस रही थी। पर अपनी सरकारी मशीनरी का ‘इंजन’ ऐसा जाम था कि हिलने का नाम ही नहीं ले रहा था। जब गांव वालों के सब्र का बांध टूटा, तो सबने ठाना,’अरे हटाओ रे भिया! अब अपुन खुद ही इंजीनियर बनेगा!’ फिर क्या था! न किसी ‘ग्लोबल टेंडर’ का ड्रामा, न अफसरों की चापलूसी। फावड़ा, बोरी, गिट्टी-पत्थर उठाया और पूरी पलटन नाले पर उतर पड़ी। जो काम झ्ेंD वाले १५ साल की फाइलों में नहीं समझ पाए, गांव वालों ने आपसी चंदे और अपने देसी दिमाग से महज ५ घंटे में ठोक-पीटकर खड़ा कर दिया! इसे कहते हैं, असली जनता का पावर!
