कविता श्रीवास्तव
भारत में चुनाव आयोग केवल एक सरकारी संस्था नहीं है। वह लोकतांत्रिक व्यवस्था का संवैधानिक स्तंभ है, जिस पर नागरिकों का चुनावी प्रक्रिया में विश्वास टिका हुआ है। मतदाता सूची तैयार करने से लेकर चुनाव कराने, आचार संहिता लागू कराने और पूरी चुनावी प्रक्रिया की निगरानी तक उसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब उसी संस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं, तो मामला केवल राजनीतिक दलों के विरोध या समर्थन का नहीं रह जाता। यह हमारे लोकतंत्र और मतदाता के अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा हो जाता है। चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर प्रक्रिया को लेकर देश में तीखी बहस चल रही है। आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची को ठीक करना जरूरी है, ताकि मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाए जा सकें और वास्तविक मतदाताओं के नाम सुरक्षित रहें। लेकिन दूसरी ओर विपक्ष और कई याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम भी सूची से हटाए जा रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, एसआईआर के दौरान ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से लगभग १३ करोड़ से अधिक नाम हटाए गए हैं। गंभीर बात यह है कि चुनाव आयोग के सदस्यों में भी आपसी सहमति नहीं है। खबर है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने एसआईआर से संबंधित निर्णयों पर कई बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। नए मतदाताओं को जोड़ने, नाम हटाने और चुनावी सॉफ्टवेयर से जुड़े पैâसलों पर सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली और एसआईआर से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई स्वीकार की है। आरोप है कि कुछ महत्वपूर्ण निर्णय आयोग के बहुसदस्यीय स्वरूप और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के अनुरूप नहीं लिए गए। अदालत का अंतिम पैâसला ही इस पूरे विवाद के सच को स्पष्ट करेगा। लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यही है कि यदि किसी योग्य नागरिक का नाम मतदाता सूची से हटता है तो उसे अपना नाम वापस जुड़वाने का सरल, समयबद्ध और प्रभावी अवसर मिले। चुनावी तकनीक नागरिकों की मददगार होनी चाहिए, बाधा नहीं। किसी सॉफ्टवेयर, दस्तावेज या प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण योग्य मतदाता मतदान से वंचित न हो, यह सुनिश्चित करना चुनाव आयोग की सर्वोच्च जिम्मेदारी है। इसीलिए आज जरूरत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़ने की है। चुनाव आयोग को एसआईआर से जुड़े सभी मानदंड, डेटा, आपत्तियों, निर्णय प्रक्रिया और नाम हटाने की प्रक्रिया को पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक करना चाहिए। जहां गलती हुई है, वहां तत्काल सुधार होना चाहिए। किसी वास्तविक मतदाता का नाम कट गया है तो ऐसे मामले में जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक के समान राजनीतिक अधिकार की अभिव्यक्ति है। इसलिए चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठे सवालों का जवाब राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, तथ्यों, कानून, पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच से मिलना चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हों या कोई भी संवैधानिक पदाधिकारी; व्यक्ति से बड़ा पद है और पद से बड़ा संविधान।
