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धनुष-बाण चिह्न आवंटन पर सुप्रीम कोर्ट का फिर सवाल… चुनाव आयोग ने किस प्रक्रिया के तहत लिया फैसला?

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

मूल शिवसेना से गद्दारी करने वाले शिंदे गुट को पार्टी का नाम और धनुष-बाण चिह्न देने के केंद्रीय चुनाव आयोग के फैसले पर सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को एक बार फिर गंभीर सवाल उठाए। न्यायालय ने पूछा कि चुनाव आयोग ने चिह्न आवंटित करने का फैसला आखिर किस प्रक्रिया के तहत लिया? क्या शिवसेना के धनुष-बाण चिह्न से जुड़ी जनभावनाओं और इस चिह्न के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए आयोग चुनाव चिह्न को फ्रीज करने का निर्णय नहीं ले सकता था? सुनवाई निर्णायक चरण में पहुंचने के बीच सर्वोच्च न्यायालय की इन टिप्पणियों से फैसले को लेकर उत्सुकता और बढ़ गई है।
शिवसेना और धनुष-बाण चिह्न से जुड़े मामले की अंतिम सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष चल रही है। बुधवार को लगातार दूसरे दिन न्यायालय ने शिंदे गुट के वकीलों से तीखे सवाल किए। वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज कौल ने शिंदे गुट की ओर से पक्ष रखते हुए चुनाव आयोग के फैसले का बचाव करने का प्रयास किया। मंगलवार को न्यायमूर्ति बागची ने सवाल उठाया था कि पार्टी चिन्ह का लाभ उस गुट को मिलना चाहिए, जिसने संवैधानिक पाप किया या उस गुट को जिसने संवैधानिक अपराध करने वाले गुट के खिलाफ शिकायत की?
आज फिर होगी सुनवाई
बुधवार को न्यायालय का कामकाज करीब आधे घंटे की देरी से शुरू हुआ। करीब साढ़े तीन बजे शिवसेना से संबंधित मामले की सुनवाई शुरू हुई। अगले करीब ४५ मिनट में शिंदे गुट के वकीलों ने आधे से अधिक समय अन्य पैâसलों के संदर्भ पढ़ने में लगाया। इसके बाद न्यायालय ने गुरुवार को दोपहर २ बजे इस मामले की सुनवाई करने पर सहमति जताई।
इसी संदर्भ में बुधवार को भी अधिवक्ता कौल से सवाल किए गए। उन्होंने सुभाष देसाई मामले और सादिक अली मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि बागी विधायकों की अयोग्यता संबंधी याचिका लंबित होने के बावजूद चुनाव आयोग चुनाव पक्ष चिह्न को लेकर निर्णय कर सकता है। इस पर न्यायालय ने फिर सवाल उठाए। पीठ ने पूछा कि चुनाव आयोग ने चिह्न आवंटन का फैसला आखिर किस प्रक्रिया के तहत लिया? क्या फैसला लेते समय उचित प्रक्रिया का पालन किया गया था? न्यायालय ने यह भी सवाल किया कि धनुष-बाण चिह्न से जुड़ी जनभावना और उसके ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए आयोग केवल चिह्न को प्रâीज करने का विकल्प नहीं अपना सकता था क्या? न्यायालय ने इस संदर्भ में अधिवक्ता कौल को सादिक अली मामले के फैसले की याद भी दिलाई।
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
चुनाव आयोग ने फैसला लेते समय दसवीं अनुसूची में बदलाव से पहले दिए गए न्यायालयीन फैसलों पर विचार किया था या नहीं, यह चुनाव चिह्न आवंटन प्रक्रिया से जुड़ा सवाल है और न्यायालय इसकी जांच कर सकता है। और चुनाव आयोग विधानमंडल में बहुमत की परीक्षा केवल तभी कर सकता है, जब कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध न हो? या उससे पहले उपलब्ध अन्य विकल्पों पर विचार करना जरूरी था?
चुनाव आयोग ने फैसला किस तरह लिया और क्या उसने अन्य विकल्पों तथा उनके संभावित परिणामों पर विचार किया था या नहीं, इसकी जांच करना आवश्यक होगा।
हर मामले में एक ही कसौटी लागू नहीं हो सकती।

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