हिमांशु राज
१४ अक्टूबर का दिन उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए केवल तीन विधायकों के पार्टी बदलने की घटना नहीं है। यह वह दिन है जब भाजपा अपने कुनबे को बढ़ाने का दावा कर रही है, लेकिन उसी क्षण उसके सामने आंतरिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी खड़ी हो रही है। सपा के तीन बागी विधायक-गौरीगंज से राकेश प्रताप सिंह, गोसार्इंगंज से अभय सिंह और कालपी से विनोद चतुर्वेदी-आज अमेठी में भाजपा की सदस्यता ले रहे हैं। यह घटना २०२७ के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल को तेज करेगी, पर इसका असर एकतरफा नहीं होगा।
तीनों विधायक २०२२ में सपा के टिकट पर चुनाव जीते थे, लेकिन २०२४ के राज्यसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में मतदान कर अपनी दूरी स्पष्ट कर दी थी। अब उनका औपचारिक प्रवेश भाजपा को अवध और बुंदेलखंड की तीन सीटों पर स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक पहुंच दे सकता है, लेकिन राजनीति में हर लाभ की कीमत होती है। इन तीनों सीटों पर भाजपा के पुराने कार्यकर्ता, स्थानीय नेता और संभावित प्रत्याशी मौजूद हैं। यदि २०२७ में टिकट वितरण में नए आए विधायकों को वरीयता दी गई और पुराने चेहरों को दरकिनार किया गया, तो भाजपा के भीतर नाराजगी उभर सकती है। बागी नेताओं को लाने से पार्टी का कुनबा बड़ा जरूर होता है, पर पुराने परिवार के भीतर असंतोष भी पैदा हो सकता है। यही खतरा भाजपा के लिए असली परीक्षा बनेगा।
इसी बीच उन्नाव से भाजपा सांसद साक्षी महाराज का लोधी समाज की सरकार और संगठन में कथित उपेक्षा को लेकर उठाया गया सवाल भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। साक्षी महाराज ने कहा है कि लोधी समाज खिसकता है तो सरकार बनाना मुश्किल हो जाता है और वे भाजपा में इस समाज की उचित पैरवी करेंगे। उनके बयान के बाद यह सवाल और तेज हो गया है कि क्या भाजपा के भीतर लोधी समाज को पर्याप्त प्रतिनिधित्व और सम्मान मिल रहा है।
यहीं अखिलेश यादव के लिए राजनीतिक अवसर बनता है। जब एक ओर भाजपा बाहर से विधायक लाकर अपनी ताकत दिखा रही है, वहीं दूसरी ओर उसके अपने सांसद सामाजिक समीकरण और संगठन में उपेक्षा का मुद्दा उठा रहे हैं। अखिलेश यादव ‘योगी बनाम लोधी’ का जो नैरेटिव तैयार कर रहे हैं, वह साक्षी महाराज के बयान के बाद और जमीन पा सकता है। इससे सपा को लोधी समाज के बीच संवाद बढ़ाने और भाजपा के भीतर की असंतुष्टि को चुनावी मुद्दे में बदलने का मौका मिल सकता है।
देखा जाए तो तीन विधायकों के जाने से सपा की संख्यात्मक स्थिति बदलने वाली नहीं है। सपा का कोर वोट बैंक अभी भी मजबूत है और अखिलेश यादव का प्रभाव राज्य में बना हुआ है। बल्कि भाजपा के लिए असली चुनौती यह है कि वह नए आए नेताओं और पुराने कार्यकर्ताओं के बीच संतुलन बनाए। यदि यह संतुलन बिगड़ा, तो आज की ‘बड़ी जीत’ कल टिकट विवाद और आंतरिक बगावत की कहानी बन सकती है।
इसलिए १४ अक्टूबर को केवल अखिलेश यादव के लिए झटके के दिन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह उन दिनों में से एक है जब भाजपा की मजबूती का दावा करने वाली घटना, उसकी आंतरिक नाजुकता को भी उजागर कर रही है। अखिलेश यादव के लिए यह मौका है कि वे बागी विधायकों के जाने को पार्टी की कमजोरी नहीं, बल्कि भाजपा के ‘बाहर से कुनबा बढ़ाने, भीतर से असंतोष बढ़ाने’ की रणनीति के रूप में प्रस्तुत करें। यदि सपा लोधी समाज, अवध और बुंदेलखंड के स्थानीय समीकरणों पर सक्रिय हो जाती है, तो आज का दिन अखिलेश यादव के लिए लंबे चुनावी संघर्ष में राजनीतिक लाभ का बीज बन सकता है।
