भिया, राजनीति में उलटबांसी की प्रतियोगिता हो तो महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे आज पहला पुरस्कार लेकर लौटें! मंगलवार को उन्होंने फरमाया कि `इंडिया’ गठबंधन का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश है। इसे भारतीय इतिहास का काला दिन भी बता दिया। ऊपर से विपक्ष को १४० करोड़ देशवासियों से माफी मांगने की नसीहत!
अरे भिया, गजबे हो गइल!
अब तक सुना था कि न्याय मांगने अदालत जाओ। मगर शिंदे भाऊ की दलील सुनकर लगता है कि अदालत जाने से पहले भी सियासी अनुमति लेनी पड़ेगी!
विपक्ष मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और कथित चुनावी अनियमितताओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। आरोपों की सत्यता अदालत में परखी जानी है। लेकिन भाऊ ने तो मार्च को ही न्यायपालिका पर हमला बता दिया! कमाल देखिए! शिंदे ने स्वयं स्वीकार किया कि विपक्ष को अदालत से न्याय मांगने का अधिकार है, लेकिन जुलूस निकालकर याचिका दाखिल करने को न्यायपालिका का अपमान बताया। यानी अधिकार मौजूद है, मगर उसके इस्तेमाल का तरीका सत्ता को पसंद आना चाहिए! बात यहीं नहीं रुकी। भाऊ ने आंदोलन के पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ होने का आरोप भी लगा दिया। अब विदेशी साजिश है तो सबूत कहां हैं? कौन-सा देश, कौन-सी एजेंसी, किसने पैसा दिया? भिया, आरोपों की रेलगाड़ी दौड़ पड़ी, मगर प्रमाण का टिकट किसके पास है?
उधर, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को प्रदर्शन संबंधी याचिकाएं सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का भरोसा दिया। यानी अदालत अपना काम कर रही है और राजनीति अपना शोर मचा रही है। भाऊ ने राहुल गांधी की शिव-तांडव वाली टिप्पणी पर भी आपत्ति जताई और शिवजी का तीसरा नेत्र खुलने की बात कह डाली! अब बताइए, चुनाव आयोग पर सवाल उठे तो लोकतंत्र खतरे में, अदालत में अर्जी पहुंचे तो न्यायपालिका खतरे में और सड़क पर जनता उतरे तो देश खतरे में!
फिर भिया, लोकतंत्र को खतरा आखिर किससे है; सवाल पूछने वालों से या हर सवाल में साजिश खोजने वालों से? ई बताइए भाऊ, लोकतंत्र सठिया गइल का… कि सियासत का हिसाब-किताबे गड़बड़ा गइल बा?
