उमा सिंह
देश की राजनीति में अब नेताओं के साथ-साथ मक्खियों ने भी ताल ठोक दी है। पहले कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) आई और अब `माखी जनता पार्टी’ (एमजेपी) ने एलान कर दिया, ‘झुकेगा नहीं, अपुन भी पार्टी बनाएगा बॉस!’ लगता है, लोकतंत्र में अब टिकट पाने के लिए जनता की सेवा नहीं, सही वक्त पर भिनभिनाना भी काफी है।
कहानी शुरू हुई सुप्रीम कोर्ट के एक मुहावरे से, ‘मक्खी मारने के लिए हथौड़ा नहीं चलाया जा सकता।’ अदालत ने बात कही अपने संदर्भ में, लेकिन मक्खी ने इसमें अपना राजनीतिक भविष्य देख लिया। बस, हथौड़े की चोट से बचते-बचाते सीधे पार्टी कार्यालय खोल लिया। खबरों के मुताबिक, महज ७२ घंटे में लाखों फॉलोअर्स और करोड़ों व्यूज का दावा भी सामने आया। यानी इंसानों की पार्टियां बरसों में लोकप्रियता तलाशती हैं, जबकि मक्खी ने तीन दिन में सोशल मीडिया पर ऐसी उड़ान भरी कि बड़े-बड़े रणनीतिकार भी सोच में पड़ गए। अब सवाल है कि जब जनता बेरोजगारी, महंगाई और समस्याओं से परेशान है, तब क्या उसे अपनी बात कहने के लिए `मक्खी’ या `कॉकरोच’ बनना पड़ेगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि आम आदमी की आवाज इतनी छोटी समझ ली गई है कि उसे सुनने के लिए भी सत्ता को लाउडस्पीकर चाहिए? माखी जनता पार्टी ने कॉकरोच जनता पार्टी से हाथ मिलाने की बात भी कही है। दोनों साथ आ गए तो गठबंधन का नया गणित बनेगा, एक रेंगेगा, दूसरा उड़ेगा और जनता फिर भी पूछेगी कि हमारा काम कौन करेगा?
कल मच्छर जनता पार्टी आई तो रातों की नींद उड़ाएगी, चींटी पार्टी बनी तो सवालों का पहाड़ खड़ा करेगी। फिलहाल मक्खी का संदेश साफ है, जनता को मामूली समझने वालों, सावधान! लोकतंत्र में आवाज भले छोटी हो, सवाल बड़ा हो सकता है।
