अरुण कुमार गुप्ता
जिस तिरंगे को हाथ में लेकर देश के नागरिक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों पर गर्व करते हैं, उसी तिरंगे के साथ प्रदर्शन करने वाले दो युवा नेताओं के तिहाड़ पहुंचने से बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। सवाल सिर्फ दो गिरफ्तारियों का नहीं, बल्कि यह है कि क्या शांतिपूर्ण विरोध के लिए जगह और अनुमति का सवाल नागरिकों की आवाज पर भारी पड़ने लगा है? कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेता आशुतोष रांका और सौरव दास को १३ अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया। दोनों ने तिरंगा लहराते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की थी। बुधवार, १४ अक्टूबर को उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया। पार्टी के संगठन प्रभारी अजिंक्य शिंदे को मुचलका भरने के बाद छोड़ दिया गया। सीजेपी का आरोप है कि उसके नेताओं को तिरंगा फहराने और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाने के कारण जेल भेजा गया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी गिरफ्तारी की आलोचना करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण विरोध के दौरान तिरंगा लहराना अपराध नहीं है। उन्होंने जंतर-मंतर को दोबारा प्रदर्शन स्थल के रूप में बहाल करने की बात कही। अब असली सवाल सरकार और प्रशासन से है। अगर नियमों का उल्लंघन हुआ है तो कार्रवाई का आधार स्पष्ट किया जाए, लेकिन क्या लोकतंत्र में विरोध के लिए पर्याप्त और सुलभ जगह उपलब्ध कराना भी सरकार की जिम्मेदारी नहीं है?
वोट पर सवाल, आखिर जनता पूछे तो पूछे किससे?
लोकतंत्र में वोट डालने से पहले अगर मतदाता को अपने नाम की चिंता सताने लगे और अपनी बात रखने के लिए सड़क पर उतरने पर पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़े, तो सवाल उठना लाजिमी है। आखिर जनता अपनी शिकायत लेकर जाए तो कहां जाए? दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर छिड़ा विवाद अब सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि चुनावी पारदर्शिता, पुलिस की जवाबदेही और नागरिक अधिकारों की बड़ी बहस बन गया है। एक तरफ विपक्ष चुनाव आयोग से मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों का हिसाब मांग रहा है, दूसरी तरफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पहुंचे कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के सदस्यों पर पुलिस कार्रवाई ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि नियमों का उल्लंघन होने पर कार्रवाई जरूरी है, तो क्या प्रदर्शन की अनुमति देने और रोकने के नियम भी पूरी तरह पारदर्शी नहीं होने चाहिए? कानून-व्यवस्था के नाम पर उठाए गए हर कदम का आधार स्पष्ट होना चाहिए, ताकि कार्रवाई पर पक्षपात के सवाल न उठें। विवाद का दूसरा मोर्चा मतदाता सूची है। विपक्ष का आरोप है कि पुनरीक्षण प्रक्रिया में मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं। चुनाव आयोग ने पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है। अब जरूरत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर स्पष्ट आंकड़े, नाम हटाने के कारण, शिकायतों की स्थिति और उनके निपटारे की जानकारी सार्वजनिक करने की है। जंतर-मंतर को अधिकृत प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के पैâसले ने भी बहस को हवा दी है।
