-विमल मिश्र
विमान से उतरकर प्रभु राम का भरत की ओर अविराम दौड़ना… पुष्पक विमान को कंधों पर उठाने के लिए यादव भाइयों में लगी होड़ और लाखों कंठों से एक साथ फूटता ‘जय श्री राम’ का निनाद… काशी में दशहरे के दूसरे दिन महज़ तीन-चार मिनट चलने वाली ‘भरत मिलाप’ की रामलीला विश्व में सबसे कम समय चलने वाला शायद सबसे बड़ा मेला है।
कैसे भी घने बादल छाए हों, घड़ी का कांटा देखकर बिल्कुल ठीक समय-शाम ४.४० बजे-छंट जाएंगे। पश्चिमगामी सूर्यदेव नाटी इमली के इस स्थल पर प्रभु-मिलन को देखने अपनी स्वर्ण रश्मियां बरसाने स्वयं उपस्थित हो जाएंगे। विमान से उतरकर प्रभु राम का भरत की ओर अविराम दौड़ना, प्रभु का १० टन वजनी पुष्पक विमान कंधों पर उठाने के लिए लाल पगड़ी पहने यादव भाइयों में होड़ और लाखों कंठों से एक साथ फूटता ‘जय श्री राम’ का निनाद… अगर आपने काशी में यह अलौकिक दृश्य देखा हो, तो सहज ही इसे भुला नहीं सकेंगे, क्योंकि इसी पल आपने साक्षात् परब्रह्म के दर्शन किए हैं।
नाटी इमली की यह रामलीला आस्था का उत्सव है। विश्व के सबसे बड़े मेलों में शामिल। यह लीला वैष्णव, शैव और रामभक्त-तीनों समुदायों का मिलन होने से काशी को इस दिन मथुरा और अयोध्या में बदल देती है। विश्वास है कि इस रामलीला के दर्शन सिर्फ वही व्यक्ति कर सकता है, जो आस्तिक हो। विश्व में सबसे कम समय चलने वाला सबसे बड़ा मेला है चित्रकूट रामलीला का यह ‘भरत मिलाप’। महज तीन-चार मिनट चलने वाली इस लीला में दृश्य और दर्शक के बीच कोई विभाजन रेखा है ही नहीं। कहते हैं कि इसी दिन गोस्वामी तुलसीदास के अनन्य शिष्य मेघा भगत को भरत मिलाप में भगवान राम-लक्ष्मण के दिव्य दर्शन हुए थे।
इसी जगत्-विख्यात भरत-मिलाप की लीला की एक घटना है। १८११ ईस्वी में पादरी मैकफर्सन ने हनुमान बने पं. टेकराम शर्मा (अन्य वृत्तांत में इनका नाम पं. गंगाराम भट्ट बताया गया है) को यह कहकर ललकार दिया था कि ‘हनुमानजी तो कूदकर समुद्र लांघ गए थे, तुम तो बस, वरुणा नदी ही कूदकर दिखा दो।’ और टेकराम भगवान का नाम लेकर लंका-दहन के प्रसंग में वर्षा ऋतु में बाढ़ से उफनती ४० हाथ चौड़ी नदी को फलांग गए थे।
रतजगा नक्कटैया का
रतजगे का ‘लाखा मेला’ कहलाने वाली चेतगंज की नक्कटैया भीड़ के हिसाब से नाटी इमली के भरत-मिलाप के साथ काशी में सबसे प्रसिद्ध है, जो करवा चौथ की अर्धरात्रि को शुरू होती है। जुलूस के रूप में होने वाली इस लीला में शूर्पणखा अपने भाइयों खर-दूषण के साथ रामजी से नाक काटे जाने का प्रतिशोध लेने सेना सहित चलती है और लहुराबीर से चेतगंज तक-नीचे सड़क पर और ऊपर छतों, खिड़कियों, बारजों पर-जहां देखो, श्रद्धालुओं के सिर ही सिर दिखाई देते हैं।
एक जमाना था, जब काशी के अमीर-उमरा लाखों का खर्च करके राजस्थान, हैदराबाद, बंगाल और उड़ीसा तक से कलाकारों को बुलवाकर इन नक्कटैयाओं के लिए झाड़-फानूस से सजे शीशे, चांदी और सोने के आभूषणों से सजे-धजे अपने ‘विमान’ निकालते थे, जिन पर परिवार के लड़कों को ‘राजकुमार’ बनाकर बैठाया जाता था। ‘ट्रिक’ दिखाते ‘लाग’ आकर्षण की दूसरी चीज थे। कालीजी की वेशभूषा में जवान और बच्चे पट्टा-बनौटी तथा तलवारबाज़ी का करिश्मा दिखाते हुए चलते थे।
चेतगंज की नक्कटैया १८८७ ईस्वी में बाबा फतेराम ने शुरू की थी। बाबा ने चेतगंज रामलीला समिति की स्थापना करके इस लीला की शुरुआत की थी। कहते हैं कि काशी के महाराजा चेतसिंह और उनके परिवार के साथ अंग्रेजों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार और १८५७ के गदर के बाद हुए अत्याचारों से क्षुब्ध होकर काशी की जनता ने यह सिलसिला शुरू किया। राष्ट्रीय आंदोलन के समय पैदल या बैलगाड़ियों पर राष्ट्रीय चेतना से संबंधित ‘स्वांग’ निकाले जाते थे।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगरसंपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)
