-उमा सिंह
इस देश में अच्छे दिन का असली नमूना देखिए। सड़क पर आदमी सुरक्षित पार निकल जाए, यह अब बहुत बड़ी मांग हो गई है। देश में `प्रधान’ के मुताबिक, विकास की गंगा तो बह रही है, मगर लगता है कि कुछ सड़कों तक पहुंचते-पहुंचते सूख जाती है। नौबत यहां तक पहुंच गई कि सुप्रीम कोर्ट के जजों को कहना पड़ रहा है कि काम नहीं हुआ तो हम दिल्ली हाई कोर्ट के गेट पर धरने पर बैठ जाएंगे। वाह रे व्यवस्था, जिस देश में न्याय दिलाने की जिम्मेदारी अदालतों की है, वहां अदालत को ही काम करवाने के लिए धरने की धमकी देनी पड़ जाए तो सब गजबे है जी..!
दिल्ली हाई कोर्ट के सामने सड़क पार करने की सुरक्षित व्यवस्था का मामला है। पैदल चलने वालों की जान जोखिम में है। समाधान चाहिए सड़क का, मगर सरकारी मशीनरी को चाहिए कमेटी। कमेटी के ऊपर कमेटी, बैठकों के ऊपर बैठकें और फाइलों के ऊपर फाइलें। सड़क पर आदमी भले कुचल जाए, लेकिन सरकारी प्रक्रिया के पहिए पूरी गरिमा के साथ चलते रहने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की नाराजगी बताती है कि मामला महज सड़क पार करने का नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक संस्कृति का है, जहां जिम्मेदारी लेने से ज्यादा आसान जिम्मेदारी टालना है। इंजीनियर काम कर सकते हैं, अधिकारी आदेश दे सकते हैं, सरकार बजट खर्च कर सकती है, लेकिन पहले एक कमेटी तो बननी ही चाहिए। आखिर फाइलों को भी तो रोजगार चाहिए।
अब २५ नवंबर की तारीख तय है। काम नहीं हुआ तो मुख्य सचिव को अदालत में जवाब देना पड़ सकता है। सवाल यह है कि जब सर्वोच्च अदालत की सख्ती के बाद भी व्यवस्था को जगाने के लिए धरने की नौबत आ रही है, तो आम आदमी की पुकार कौन सुनेगा? यह लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि जनता न्याय के लिए अदालत जाती है और अदालत को काम के लिए धरने की बात करनी पड़ती है। जिस देश में जज को भी धरने की चेतावनी देनी पड़े, वहां समझ लीजिए कि समस्या सड़क में गड्ढे की नहीं, व्यवस्था की बुनियाद में है..!
