मुख्यपृष्ठस्तंभअंकिता को न्याय का इंतजार,...गौतम ने संभाली राज्यपाल की कुर्सी!

अंकिता को न्याय का इंतजार,…गौतम ने संभाली राज्यपाल की कुर्सी!

-नियुक्ति पर परिवार का विरोध, निष्पक्ष जांच की मांग ने पकड़ा जोर
सिक्किम के १९वें राज्यपाल के रूप में भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत कुमार गौतम का शपथ ग्रहण केवल एक संवैधानिक नियुक्ति तक सीमित नहीं रहा। उत्तराखंड के चर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड से जुड़े विवाद ने इस समारोह को राजनीतिक और नैतिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। एक ओर संवैधानिक प्रक्रिया के तहत नई जिम्मेदारी संभालने वाले गौतम हैं, तो दूसरी ओर न्याय की मांग पर अडिग पीड़ित परिवार और उन सवालों के जवाब तलाशता समाज है, जो इस मामले में अब तक पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं।
सितंबर २०२२ में पौड़ी गढ़वाल के एक रिसॉर्ट में काम करने वाली १९ वर्षीय अंकिता की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। रिसॉर्ट मालिक पुलकित आर्य और उसके दो सहयोगियों को इस मामले में दोषी ठहराए जाने के बावजूद कथित ‘वीआईपी’ की भूमिका का सवाल सार्वजनिक विमर्श में बना रहा। दिसंबर २०२५ में अभिनेत्री उर्मिला सनावर द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद विवाद ने फिर जोर पकड़ा। गौतम ने आरोपों को खारिज किया है और मानहानि का मुकदमा भी दायर किया। इसलिए आरोपों को सिद्ध तथ्य मानना उचित नहीं होगा; लेकिन उनकी सत्यता और जांच की पारदर्शिता को लेकर उठे प्रश्नों का निष्पक्ष समाधान जरूरी है।
गौतम की नियुक्ति का अंकिता के माता-पिता ने विरोध किया। कांग्रेस ने भी इसे राजनीतिक और नैतिक जवाबदेही से जुड़ा मुद्दा बनाते हुए आंदोलन तेज करने की घोषणा की। सिक्किम बार एसोसिएशन की ओर से नियुक्ति स्थगित करने की मांग ने विवाद को राज्य की सीमाओं से बाहर पहुंचा दिया। इससे स्पष्ट है कि बहस केवल किसी एक व्यक्ति की नियुक्ति पर नहीं, बल्कि उच्च संवैधानिक पदों के प्रति जनता के विश्वास पर भी केंद्रित है।
राज्यपाल का पद दलगत राजनीति से ऊपर उठकर संविधान की मर्यादा का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे पद पर नियुक्ति के समय सरकार से अपेक्षा होती है कि वह कानूनी प्रक्रिया के साथ सार्वजनिक विश्वास और नैतिक जवाबदेही को भी महत्व दे। हालांकि, केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना भी न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
इसी संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद ३६१ पर चर्चा महत्वपूर्ण है। यह राज्यपाल को कार्यकाल के दौरान कुछ कानूनी कार्यवाहियों से संरक्षण प्रदान करता है, लेकिन इसे किसी भी आरोप से स्थायी मुक्ति या जांच से पूर्ण छूट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। संवैधानिक संरक्षण की सीमाओं और कानूनी प्रक्रिया के बीच अंतर स्पष्ट रहना आवश्यक है।
अंकिता के परिवार की मांग का मूल प्रश्न है-क्या पूरे मामले के हर पहलू की निष्पक्ष जांच हुई है? इसका जवाब राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच, ठोस साक्ष्यों और जवाबदेह संस्थागत कार्रवाई से मिल सकता है। लोकतंत्र में संवैधानिक पद की गरिमा और पीड़ित परिवार को न्याय, दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। असली कसौटी यही है कि सत्ता के पैâसलों से ऊपर कानून और न्याय की विश्वसनीयता बनी रहे।

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