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विजय-विमर्श : चुनावी निष्पक्षता पर सवाल: ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ में क्या होगा?

-विजयशंकर चतुर्वेदी

लोकतंत्र में चुनाव की निष्पक्ष प्रक्रिया ही नतीजे की स्वीकार्यता तय करती है। यदि प्रक्रिया पर ही संदेह पैदा हो जाए, तो नतीजे चाहे कितने भी निर्णायक हों, उनकी नैतिक वैधता का सवाल बना रहेगा। बिहार और बंगाल विधानसभा के चुनावों में लाखों नाम चुपचाप मतदाता सूची से गायब हो जाते हैं, फिर पात्र मतदाताओं को मतदान से पहले न्याय नहीं मिलता और जब नतीजे अनुकूल आ जाते हैं तो विपक्षी दलों के द्वारा पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाने को बीजेपी ‘हार की खीझ’ कहकर चिढ़ाती है।
वयस्क मताधिकार की हत्या
जरा पश्चिम बंगाल के आंकड़े देखिए। जांच के लिए चिह्नित ६०.०६ लाख मामलों में से २७.१६ लाख नाम हटाए गए। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बने अपीलीय न्यायाधिकरण मतदान से महज कुछ दिन पहले सक्रिय हुए। मतदान से पहले केवल १,६०७ नाम बहाल हो सके। बाद में तय हुई करीब ८३,००० अपीलों में ७५,४४३ नाम सूची में लौटे। आयोग और सरकार के समर्थक तुरंत कहेंगे कि देखो, ९१ प्रतिशत अपीलें स्वीकार हो गर्इं! लेकिन यह २७ लाख का ९१ प्रतिशत नहीं है। इसका जवाब कौन देगा कि मतदान के बाद बहाल हुआ नाम, वोटों की गिनती का हिस्सा नहीं बनता। यह वयस्क मताधिकार की वास्तविक हत्या है।
चुनावी सिस्टम पर किसका नियंत्रण
गोवा का मामला और भी साफ कर देता है कि असल समस्या सिस्टम की है। वहां ९७ लोगों को सुनवाई के बाद पात्र पाया गया, लेकिन आयोग के सॉफ्टवेयर में नाम हटाने के बाद बहाली का विकल्प ही मौजूद नहीं था। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने आठ बार सुधार का अनुरोध किया। अंतिम सूची प्रकाशित होने से पहले वह सुविधा सक्रिय नहीं हुई। आयोग का जवाब है कि नाम जोड़ने-हटाने का वैधानिक अधिकार इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर के पास है। लेकिन जब ‘ईआरओ’ का फैसला सॉफ्टवेयर में दर्ज ही न हो सके, तो असली नियंत्रण किसके पास है? स्पष्ट है कि व्यावहारिक नियंत्रण केंद्रीकृत तकनीकी व्यवस्था के पास था, जो असंवैधानिक है।
और यह सिर्फ विपक्ष या बाहरी आलोचकों का आरोप नहीं। दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में कम-से-कम १४ बार आयोग के पैâसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्ति दर्ज की। मतदाता डेटा और सॉफ्टवेयर के केंद्रीकृत नियंत्रण, फॉर्म-६ में बदलाव तथा नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया पर उनकी चिंताएं दर्ज हैं। यदि सब कुछ सामान्य, पारदर्शी और सर्वसम्मत था, तो बार-बार लिखित आपत्तियां क्यों दर्ज हुर्इं? और उनका निपटारा सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
चुनावी गड़बड़ का राष्ट्रीयकरण?
इस पृष्ठभूमि में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को सिर्फ चुनावी खर्च, बेहतर इंतजाम और समय घटाने की तकनीकी योजना मानना भोलापन होगा। याद कीजिए, कोविंद समिति ने साझा मतदाता सूची की सिफारिश की थी। जब चुनावों का समय, डेटा और प्रबंधन केंद्रीकृत करने की मंशा स्पष्ट हो, तब सवाल उठता है कि क्या ऐसी व्यवस्था में मात्र एक तकनीकी या प्रशासनिक गलती देश भर में लाखों मतदाताओं को चुनाव प्रक्रिया से बाहर नहीं कर देगी? बंगाल और गोवा के अनुभव तो यही बताते हैं कि यह जोखिम असली है। ऐसे में केंद्रीकरण का अर्थ दक्षता नहीं, चुनावी गड़बड़ का राष्ट्रीयकरण भी हो सकता है।
क्रोनोलॉजी देखिए। २०२३ के कानून से नियुक्ति-समिति में सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम फॉर्मूले वाले मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को रख दिया गया। उसी कानून की धारा १६ पद छोड़ चुके आयुक्तों को भी आधिकारिक काम से जुड़े कृत्यों पर दीवानी या आपराधिक कार्यवाही से व्यापक सुरक्षा देती है। फिर राज्यों के चुनाव की धांधली उभरती है, और जब जनता ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करती है, तो उसका पुलिसिया दमन किया जाता है। दिल्ली का प्रसिद्ध धरना स्थल ही बैन कर दिया गया! अब मोदी सरकार किस मुंह से कह सकती है कि डेटा केंद्रीकरण का इस्तेमाल चुनावी नतीजों को अपने पक्ष में ढालने के लिए नहीं होगा।
आशंकाओं के काले बादल
यदि सरकार और आयोग सचमुच निष्पक्ष हैं, तो स्वतंत्र सॉफ्टवेयर ऑडिट स्वीकार करें, हर हटाए गए नाम का सार्वजनिक कारण बताएं, और मतदान से पहले अपील निपटाने की बाध्यकारी समय-सीमा लागू करें। वरना ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के प्लान को जनता इसी आशंका के साथ देखेगी कि कहीं केंद्रीकृत व्यवस्था पूरे देश में मतदाताओं को चुन-चुन कर हटाने का औजार तो नहीं बन जाएगी?
माना कि लोकतंत्र सिर्फ नतीजों का नाम नहीं है। लेकिन क्या मोदी सरकार और आरएसएस के इकोसिस्टम को आपके वोट, देश की साख और चुनावी पारदर्शिता की रत्ती भर भी परवाह है?
(‘निर्णय का स्थापत्य’ पुस्तक के लेखक राष्ट्रीय नीति एवं सामाजिक मुद्दों पर नियमित रूप से लिखते हैं।)

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