मुख्यपृष्ठस्तंभमुस्लिम वर्ल्ड : धधक रहा फ्रांस, ट्रंप क्यों मार रहे ताने?

मुस्लिम वर्ल्ड : धधक रहा फ्रांस, ट्रंप क्यों मार रहे ताने?

सूफी खान

फ्रांस में स्कूलों की खस्ता हालत और एजुकेशन सिस्टम को दुरुस्त करने के मकसद से शुरू हुए प्रदर्शन हिंसक हो गए और फिर उसमें मुस्लिम एंगल जोड़ने की कवायद भी जोर-शोर से चल रही है। अमेरिका में चल रहे मिडटर्म इलेक्शन के बीच प्रेसिडेंट ट्रंप ने फिर दावा किया कि फ्रांस की राजधानी पेरिस जल्द ही मुस्लिम शहर बन जाएगी। ट्रंप इसके लिए फ्रांस की इमिग्रेशन पॉलिसी को जिम्मेदार ठहराते हैं। इससे पहले भी ट्रंप ने कहा था कि प्रâांस में चल रहे विरोध प्रदर्शन स्कूलों का मुद्दा नहीं हैं, बल्कि ये फ्रांस में बेलगाम तरीके से हो रहे इमिग्रेशन और इस्लाम के फ्रांस पर कब्जा करने से जुड़ा हुआ मामला है। वह खुलकर इसके पीछे की वजह इस्लाम को बता रहे हैं। अब ट्रंप ने दावा किया है कि फ्रांस की राजधानी पेरिस जल्द ही मुस्लिम शहर बनने वाला है। क्या यह मुमकिन है? इसे आंकड़ों से समझना जरूरी है। फ्रांस में आज भी सबसे बड़ा धर्म ईसाई धर्म है। इस्लाम का नंबर उसके बाद आता है। प्यू रिसर्च, जो एक भरोसेमंद एजेंसी मानी जाती है की रिपोर्ट के मुताबिक, ज्यादा इमिग्रेशन की स्थिति में साल २०५० तक फ्रांस की कुल आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी १८ प्रतिशत तक पहुंच सकती है। मौजूदा उपलब्ध सर्वे के मुताबिक, यह हिस्सेदारी करीब १० प्रतिशत है। मुस्लिम आबादी में बढ़ोतरी के संकेत तो मिलते हैं, मगर ऐसा कहना कि पेरिस या कोई और शहर मुस्लिमों का शहर हो जाएगा, ठीक नहीं होगा, क्योंकि डेटा बताते हैं कि फ्रांस में अभी भी कैथोलिकों की आबादी सबसे ज्यादा है और मुस्लिम उसे पार कर पाएं, ऐसा फिलहाल आंकड़ों से साबित नहीं होता है।
फ्रांस में आंदोलन की शुरुआत स्कूलों में शिक्षकों, नर्सों और स्टाफ की कमी से हुई, लेकिन अब इस आंदोलन पर अमेरिका की राजनीति का असर भी दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों को सिर्फ स्कूलों की समस्या मानने से इनकार किया है। उन्होंने कहा था कि यह बेकाबू सामूहिक प्रवासन और इस्लाम के फ्रांस पर कब्जे की कोशिश से जुड़ा है। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर यह बात कुछ दिनों पहले लिखी थी।
ट्रंप इन आंदोलनों के पीछे इस्लाम के बढ़ते प्रभाव को क्यों देख रहे हैं? इसे लेकर एक्सपर्ट कहते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान को अमेरिकी और यूरोपीय दक्षिणपंथ की राजनीति के नजरिए से समझा जा सकता है। इस किस्म की सियासत में यूरोप के कई विरोध प्रदर्शनों को इमिग्रेशन, इस्लाम और सुरक्षा के मुद्दों से जोड़कर देखा जाता है। ट्रंप लंबे समय से अमेरिका में सख्त बॉर्डर पॉलिसी और अवैध प्रवासन के खिलाफ सख्त रुख रखते हैं। ऐसे में प्रâांस की अशांति को वह अमेरिकी बहस के लिए एक मिसाल की तरह पेश कर रहे हैं। यानी प्रâांस में जो समस्या स्कूल से जुड़कर शुरू हुई, उसे ट्रंप एक बड़ी मजहबी दिक्कत के तौर पर देख रहे हैं।
हालांकि, यह भी समझना जरूरी है कि यूरोपीय देशों में फिलिस्तीन के मुद्दे पर ईसाई समुदाय के लोगों का रुख भी काफी अलग रहा है। वे फिलिस्तीन को एक राज्य के तौर पर देखते हैं। गाजा में जंग के बीच इजरायल की आलोचना भी देखी गई है। आंदोलन को धार्मिक रंग देने की ट्रंप की कोशिशों को प्रâांसीसी अधिकारी पहले ही खारिज कर चुके हैं।

अन्य समाचार