एड. राजीव मिश्र, मुंबई
गांव के रामदीन अउर स्यामदीन दुई सगे भाई रहेन। बाप-दादा के छोड़ी बीस बिस्वा जमीन रही। जब तक बाप जियत रहे, दुनौ भाई एकै थारी मा खात रहेन, मुला बाप के आंखि मूंदते ही जमीन के मेड़ अइसन खिंचि गय कि भाईचारा के छाती चिराय लाग। रामदीन कहय, ‘हमार खेत मा तोहार हल काहे चलत है?’ स्यामदीन गरजै, ‘अरे, जवन बाप के लड़िका तू हौ हमहूं तौ ओही बाप के लड़िका हई!’ बात नाप-जोख से सुरू भै, गारी-गलौज तक पहुंची अउर फिर लाठी-डंडा चलि गवा। मेड़ पर खड़ा आम के पेड़ चुपचाप सोचत रहा, जिनके बचपन एवैâ आंगन मा बीता, उ अब एक-दूसरे के खून के पियासे होइ गवा! मारपीट मा दुनौ के माथा फूट गवा। गांव वाले समझाइन, ‘भइया, जमीन तौ इहैं रहि जाई, तुम लोग ऊपर चलि जइहौ।’ मुला दुनौ के कान मा जइसे रूई ठुंसी रही। आखिरकार फैसला भवा, अब थाने मा होई। थाने पहुंचते ही दरोगा जी के दरबार मा पेशी भई। दरोगा जी कुर्सी पर अइसन बिराजे रहेन, जइसे जिला-जवार के धरती-आकाश के पट्टा उन्हैं के नाम लिखाय होय। मूंछ पर ताव, पेट पर बेल्ट अउर हाथ मा डंडा पूरा न्याय विभाग एकै देह मा समाय रहा। दरोगा जी गरजे, ‘कौन हौ रामदीन?’ ‘हुजूर, हम।’ ‘अउर कौन हौ स्यामदीन?’ ‘हुजूर, हम।’ ‘तौ दुनौ ससुरे भाई होइके लड़त हौ? बाप की जमीन है कि तोहरे ननिहाल की?’ दुनौ हाथ जोड़ि के खड़ा होइ गेन। अब तक जे एक-दूसरे के छाती पर चढ़े जात रहेन, उ दरोगा जी के सामने बकरी बनि गयेन। दरोगा जी डंडा मेज पर पटकत बोले, ‘कानून सबके बराबर है! अब जमीन की पैमाइश मा होई!’ फिर मुंशी जी के कान मा धीरे से कुछ कहिन। मुंशी जी दुनौ का बाहर लेइ गए अउर समझाइन, ‘देखौ भइया, दरोगा जी के चाय-पानी, कागज-पत्तर अउर दौड़-धूप मा खर्चा लागत है। समझदार हो तौ मामिला आपस मा सुलटाइ लौ।’ दुनौ भाई एक-दूसरे का मुंह तावैâ लागेन। जमीन के बटवारे मा आधा-आधा हिस्सा चाही रहा, मुला थाने के चक्कर मा जेब का पूरा हिस्सा निकलै लाग! अगले दिन गांव के लेखपाल से नाप कराय के दुनौ समझौता करि लिहिन। मेड़ बंटि गय, खेत बंटि गवा। लेकिन यहि सब मा दूनौ भाई के दस-दस हजार रुपया पुलिस थाना पर नजराना देवाय के पर। गांव के बूढ़ दादा हंसि के बोले, ‘वाह रे कानून! खेत नापै लेखपाल, फैसला करै दरोगा अउर कीमत चुकावै किसान! अब तौ समझ मा आवा गांव मा जमीन के झगड़ा छोट होइ सकत है, मुला थाने के रुतबे के नाप आज तक कउनो नापि नाय पावा!’
