अरुण कुमार गुप्ता
बिहार में शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची को लेकर उठे सवालों ने चुनावी व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर बहस छेड़ दी है। पटना साइंस कॉलेज की ओर से पांच कथित फर्जी मतदाताओं और तीन वास्तविक शिक्षकों के नाम छूटने की शिकायत सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर मतदाता सूची तैयार करने और उसका सत्यापन करने में किस स्तर पर चूक हुई? मामला इसलिए गंभीर है, क्योंकि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता सूची ही लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की बुनियाद है। शिकायत के मुताबिक, सूची में पांच ऐसे मतदाताओं के नाम होने पर आपत्ति जताई गई है, जिनकी पात्रता पर सवाल उठाए गए हैं। वहीं तीन वास्तविक शिक्षकों के नाम शामिल नहीं होने की बात कही गई है। यदि जांच में ये शिकायतें सही साबित होती हैं, तो यह केवल कागजी गलती नहीं, बल्कि मतदाता सूची के सत्यापन की गंभीर विफलता मानी जाएगी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि मतदाता सूची तैयार करते समय संबंधित शिक्षण संस्थानों के रिकॉर्ड का मिलान किया गया था या नहीं? क्या नियुक्ति और पात्रता संबंधी दस्तावेजों की जांच हुई? शिकायतें सामने आने के बाद जिम्मेदार अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की?
जेडीयू में बगावत की आग!
बिहार की सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) में अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है। पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित किए गए पूर्व प्रदेश महासचिव अरविंद कुमार सिंह उर्फ छोटू सिंह ने प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पटना में मीडिया से बातचीत के दौरान छोटू सिंह ने कुशवाहा पर गंभीर आरोप लगाए और उनकी राजनीतिक हैसियत को चुनौती दी। उनके बयानों ने जेडीयू के संगठनात्मक अनुशासन और आंतरिक लोकतंत्र को लेकर नई बहस छेड़ दी है। छोटू सिंह ने दावा किया कि यदि उनका सहयोग नहीं होता तो उमेश कुशवाहा चुनाव भी नहीं जीत पाते। उन्होंने कुशवाहा पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए और कहा कि वह उनके खिलाफ ऐसे खुलासे करेंगे, जिससे उनकी राजनीतिक मुश्किलें बढ़ सकती हैं। जेडीयू की प्रदेश कार्यकारिणी में जगह नहीं मिलने के बाद छोटू सिंह की नाराजगी बढ़ने की खबरें सामने आई थीं। पार्टी सूत्रों के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, संगठन में पद को लेकर उनकी राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा से भी बहस हुई थी। इसके बाद जुलाई २०२६ में पार्टी ने उन्हें कथित पार्टी-विरोधी गतिविधि के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया था।
एनडीए के चुनावी गणित को आनंद मोहन का ‘झटका’!
बिहार विधान परिषद के सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव अब सिर्फ उम्मीदवारों की लड़ाई नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों और सामाजिक प्रतिनिधित्व की परीक्षा भी बनता जा रहा है। पूर्व सांसद आनंद मोहन ने निर्दलीय प्रत्याशी डॉ. राहुल राज को समर्थन देने की घोषणा कर चुनावी मुकाबले को नई चर्चा दे दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने एनडीए की सीट बंटवारे की रणनीति और सारण में राजपूत समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी सवाल उठाए। आनंद मोहन का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में विभिन्न दलों और निर्दलीय प्रत्याशियों के बीच मुकाबला तेज है। एनडीए की ओर से जदयू के आनंद पुष्कर मैदान में हैं, जबकि राहुल राज निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में आनंद मोहन का समर्थन राहुल राज के अभियान को राजनीतिक चर्चा में ला सकता है। इस घटनाक्रम का एक अहम पहलू सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल है। आनंद मोहन ने जिस तरह सारण में राजपूत समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी का मुद्दा उठाया है, उससे चुनावी बहस केवल शिक्षकों की समस्याओं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसमें सामाजिक समीकरण भी जुड़ जाते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आनंद मोहन के समर्थन का असर मतदाताओं पर कितना पड़ेगा।
