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मतदाता सूची की मशीन को महाराष्ट्र ने पढ़ाया कानून!.. अब आयोग को बदलने पड़े चार नियम

 सामना संवाददाता / मुंबई

मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया जितनी तकनीकी दिखाई देती है, उतनी ही संवेदनशील भी है। महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की आपत्तियों के बाद निर्वाचन आयोग द्वारा पुनरीक्षण प्रक्रिया और ईसीआईएनईटी सॉफ्टवेयर में चार बदलाव किए जाने की रिपोर्ट इसी संवेदनशीलता को सामने लाती है। नए प्रावधानों में निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों को अधिक विवेकाधिकार और मतदाताओं को दस्तावेज प्रस्तुत करने में अतिरिक्त लचीलापन मिलने की बात कही गई है।
सवाल यह है कि यदि पहले की व्यवस्था में इतनी कठोरता थी कि नियम बदलने पड़े, तो उससे प्रभावित नागरिकों का क्या होगा? क्या पुराने मामलों की दोबारा समीक्षा होगी? क्या उन मतदाताओं को सूचना मिलेगी जिनके आवेदन दस्तावेजों की कमी के कारण अटके थे? चुनाव आयोग का दायित्व केवल मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाना नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक के मताधिकार की रक्षा करना भी है। तकनीक प्रक्रिया को आसान बनाए, नागरिकों के सामने नई बाधाएं खड़ी न करे। इन बदलावों की वास्तविक सफलता का पैमाना आयोग की घोषणा नहीं, बल्कि मतदाता सूची में त्रुटियों का कम होना और शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण होगा।
चार बदलाव, लेकिन पुराने मतदाताओं का क्या होगा?
महाराष्ट्र की आपत्तियों के बाद निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया में चार बदलाव किए हैं। दस्तावेजों के विकल्प बढ़ाने, अनावश्यक व्यक्तिगत सुनवाई कम करने और निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों को अधिक अधिकार देने की बात सामने आई है, लेकिन असली सवाल पुराने मामलों का है। जिन मतदाताओं के आवेदन पहले खारिज हुए, क्या उन्हें दोबारा अवसर मिलेगा? जिनके नाम सूची से हटे, उन्हें कैसे राहत मिलेगी? आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि नए नियम कब से लागू होंगे और पिछली त्रुटियों का सुधार कैसे होगा। मतदाता सूची की शुद्धता जरूरी है, लेकिन किसी पात्र नागरिक का मताधिकार छिनना स्वीकार्य नहीं हो सकता।

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