केवल सत्ता या शासन बदलने से देश के मूलभूत सवाल हल नहीं होते, ऐसा सरसंघचालक मोहन भागवत का कहना है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयादशमी सम्मेलन में भागवत द्वारा प्रस्तुत यह भूमिका भ्रम पैदा करने वाली है। भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में इस समय जो आंदोलन चल रहे हैं, उन पर भागवत ने चिंता व्यक्त की। ऐसे आंदोलनों के कारण फूट का खतरा होने की बात सरसंघचालक कहते हैं, यह लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा। भागवत यानी सरसंघचालक दशहरा सम्मेलन में क्या भूमिका लेते हैं, इस ओर कई लोगों का ध्यान लगा होता है। संघ एक सांस्कृतिक संगठन है (ऐसा भागवत कहते हैं) और उसका दायरा हाल के दिनों में बढ़ा है। दुनिया के कई देशों में संघ का कार्य पैâला है। श्री भागवत हाल ही में अमेरिका, लंदन, यूरोप के कुछ देशों की यात्रा करके लौटे हैं। उनमें से कुछ देशों में जनता ने सत्ताधारियों के खिलाफ खुलकर बगावत की। फ्रांस तो सुलग ही रहा है। इटली, बेल्जियम में अल्बेनिया की जनता ने शासकों के खिलाफ आवाज बुलंद की। उससे पहले नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश में लोगों ने आंदोलन करके शासकों की मनमानी पर लगाम कसी। भागवत को जनता का यह गुस्सा मंजूर नहीं है। वे कहते हैं, `आंदोलन राजनीतिक स्वार्थ के हथियार बनकर समाज में फूट पैदा कर सकते हैं। अपने हित साधने वाली शक्तियां राजनीतिक स्थिति बदलने के लिए शासन बदलने का रास्ता अपनाती हैं। हालांकि, उसके अपेक्षित परिणाम शायद ही हासिल होते हैं। शासन बदलने से सवाल हल होंगे ही, ऐसा नहीं है।’ श्री भागवत के बयान पर
राष्ट्रीय चर्चा होना
जरूरी है। भागवत के वक्तव्य का सीधा, सरल अर्थ समझाना हो तो २०१४ में मोदी के नेतृत्व में जो सत्ता परिवर्तन किया गया, वह व्यर्थ गया। पिछले १२ वर्षों में देश का कोई भी सवाल हल नहीं हो सका। भागवत की यह बात मान ली जाए तो मोदी का कार्यकाल व्यर्थ गया है। इस व्यर्थ गए कालखंड की ओर किस रूप में देखा जाए? मनमोहन सिंह के सभ्य शासन को हटाकर संघ की मदद से जो राजनीतिक फेरबदल हुआ, उसके दुष्परिणाम देश अब भुगत रहा है। इस दौरान महंगाई ने कहर बरपाया। बेरोजगारी बढ़ी। युवा `डिप्रेशन’ में आ गए हैं। अपराध बढ़े। लोकतंत्र का अंत होकर व्यापारियों का तानाशाही राज शुरू हो गया। मोदी-शाह की मर्जी के उद्योगपतियों को देश की संपत्ति मुफ्त में सौंप दी गई। भारत अमेरिका का गुलाम बन गया। किसान वर्ग का जीना दूभर हो गया। महिलाओं का शोषण करने वालों को कानून का संरक्षण मिले, इसलिए अपराधियों को राज्यपाल बनाया गया। नीट पेपर लीक के खिलाफ विद्यार्थी सड़कों पर उतरे। आंदोलन करने वाली छात्राओं पर पुलिस ने बर्बर हमले किए। १३ करोड़ मतदाताओं को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित किया गया। अदालतें, चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा जमाकर लोकतंत्र को दफन करने वाला व्यापारी शासन भारत में है। उन्होंने संसद की पवित्रता भी नष्ट कर दी। यह शासन आए, इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ ने गांव-गांव में प्रचार किया। शिविर लगाए। धर्म की अफीम लोगों को दी। भाजपा ने मनमोहन सरकार के खिलाफ आंदोलन करके
देश में अराजकता जैसी
स्थिति तब पैदा की। चीन ने गलवान घाटी में २० भारतीय जवानों की हत्या की। पहलगाम, पुलवामा जैसी घटनाएं कश्मीर में हुर्इं और पाकिस्तान के खिलाफ शुरू किया गया `ऑपरेशन सिंदूर’ राष्ट्रपति ट्रंप के दबाव में प्रधानमंत्री मोदी ने समेट लिया। इतना बेपरवाह शासन संघ की मदद से देश में सत्ता में आया और उस सरकार ने देश को गड्ढे में डाला, इसके लिए संघ को देशवासियों से माफी मांगनी ही चाहिए, लेकिन इस भ्रष्ट, निर्दयी शासन के खिलाफ आवाज उठाने वाली जनता के बारे में श्री भागवत कहते हैं, `यह भारत को कमजोर करने का प्रयास है।’ लोकतंत्र में आंदोलन होने ही चाहिए, वरना शासक निरंकुश हो जाते हैं। वैसे वे अब हो ही चुके हैं। सवाल सिर्फ इतना है कि दिल्ली में `जेन जी’ का सरकार विरोधी आंदोलन भड़कने पर सरसंघचालक ने मुंबई में `जेन जी’ का सम्मेलन लेकर उनसे संवाद साधा था और `उनकी बात सुनी जानी चाहिए’ ऐसा मत व्यक्त किया था। मोदी-शाह की सत्ता के खिलाफ लोगों द्वारा पुकारा गया आंदोलन लोकतंत्र के अनुरूप है। तब सरसंघचालक को भारत के लिए संकट बने शासन को बल नहीं देना चाहिए। अत्यंत महत्वपूर्ण सवाल यह है कि देश के स्वतंत्रता संग्राम में जनता नहीं उतरी होती तो क्या भारत देश गुलामी से आजाद हुआ होता और एक गणतांत्रिक देश के रूप में भारत को मान्यता मिली होती? राम मंदिर के लिए किया गया आंदोलन अराजकता था? संघ की प्रेरणा से हुआ अन्ना आंदोलन अराजकता था? श्री भागवत को इस पर अपने विचार अवश्य रखने चाहिए। १९७७ में सत्ता परिवर्तन के लिए संघ परिवार की भागीदारी महत्वपूर्ण थी। तो क्या अब संघ को उस सत्ता परिवर्तन पर पछतावा हो रहा है? प्रश्न सीधा है!
