मुख्यपृष्ठस्तंभविजय-विमर्श : क्या जनता ने ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ देख लिया?

विजय-विमर्श : क्या जनता ने ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ देख लिया?

विजयशंकर चतुर्वेदी

जब पूरे देश में १३ करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम हटने की आशंका हो, उत्तर प्रदेश में मनमाने ढंग से करीब दो करोड़ नाम कम हो जाएं और बिहार तथा पश्चिम बंगाल में घुसपैठियों की पहचान के नाम पर लाखों मतदाता सूची से बाहर कर दिए जाएं, तो इसे महज प्रशासनिक सफाई कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। सवाल है कि नरेंद्र मोदी सरकार के दौर में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली ऐसी क्यों होती जा रही है कि विपक्ष को चुनावी निष्पक्षता का सवाल लेकर सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ रहा है? क्या सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले से पहले ही मतदाताओं को ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ नजर आने लगा है?
१३ करोड़ नाम और चुनावी गणित
भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने चुनाव आयोग के आंकड़ों के हवाले से बताया कि इनमें लगभग २.८ करोड़ मृत, ६.३ करोड़ स्थानांतरित, एक करोड़ दोहरी प्रविष्टि वाले और करीब तीन करोड़ अप्राप्य मतदाता शामिल हैं। लेकिन किसी मतदाता का पता न मिलना और उसका मतदान का अधिकार समाप्त हो जाना एक ही बात वैâसे हो सकती है? यहां मुद्दा विपक्ष द्वारा सबूतों के ढेर पेश करने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि कोई पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न हो।
एसआईआर के बाद विभिन्न राज्यों से आए आंकड़ों के बीच सबसे बड़ा सवाल है कि नाम हटाने की प्रक्रिया का चुनावी नतीजों पर क्या असर पड़ा होगा। किन इलाकों में कितने नाम कटे? किन सामाजिक समूहों के मतदाता प्रभावित हुए? कितने पात्र मतदाताओं को दोबारा सूची में जगह मिली? इन सवालों का जवाब पारदर्शी आंकड़ों और स्वतंत्र जांच से ही मिल सकता है, जो फिलहाल नदारद है।
ज्ञानेश कुमार के फैसले कटघरे में
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग ने २६ अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा कि एसआईआर से संबंधित २४ जून २०२५, २७ अक्टूबर २०२५ और १४ मई २०२६ के आदेश तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से जारी हुए थे। आयोग ने फॉर्म-६ में संशोधन के आरोपों को भी खारिज किया। लेकिन विपक्ष ने आयोग के आंतरिक रिकॉर्ड और निर्णय-प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में फाइलों और आंतरिक टिप्पणियों को सुरक्षित रखने की मांग की, ताकि फैसलों की प्रक्रिया की जांच हो सके। तर्क यह है कि यदि आयोग के पैâसले पूरी तरह पारदर्शी और सर्वसम्मत थे, तो निर्णय-प्रक्रिया से जुड़े सवालों का जवाब रिकॉर्ड सामने रखकर क्यों नहीं दिया जाना चाहिए?
ये रिश्ता क्या कहलाता है?
राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय, राजद के तेजस्वी यादव, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के संजय राऊत और अन्य विपक्षी नेताओं ने १२ अक्टूबर को संयुक्त याचिका दायर की। एकजुट हुए विपक्ष ने एसआईआर की न्यायिक निगरानी, हटाए गए नामों के स्वतंत्र ऑडिट और आयोग के आंतरिक रिकॉर्ड सामने लाने की मांग भी की है।
लेकिन मोदी सरकार और भाजपा एसआईआर को वैध प्रक्रिया बताकर उसका बचाव कर रही हैं। लेकिन इस मूल सवाल का जवाब नहीं मिल रहा है कि पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से कटने से रोकने की गारंटी क्या है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हों और भाजपा मुख्य चुनाव आयुक्त के बचाव में खड़ी हो, तो इस रिश्ते पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सुप्रीम कोर्ट की निगाह में चुनाव आयोग
२७ अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने आयोग के हलफनामे पर विपक्ष को जवाब देने का समय दिया और अगली सुनवाई १७ नवंबर के लिए निर्धारित की। तृणमूल सांसद डोला सेन की फॉर्म-६ से संबंधित याचिका पर भी नोटिस जारी हुआ।
लेकिन राजनीतिक सवाल अपनी जगह कायम है: यदि मतदाता सूची में इतनी बड़ी कटौती होती है और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठते हैं, तो जवाबदेही कौन तय करेगा? येन-केन-प्रकारेण नाम हटाना नहीं, बल्कि हर पात्र नागरिक का मतदान अधिकार सुरक्षित रखना चुनाव आयोग का दायित्व है। मोदी सरकार को बताना चाहिए कि चुनावी प्रक्रिया पर उठते संदेह दूर करने के लिए वह पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच के पक्ष में मजबूती से क्यों नहीं खड़ी होती।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे समसामयिक मुद्दों और राष्ट्रीय नीतियों पर नियमित लेखन करते हैं।)

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