-एक महीने में दो वरिष्ठ पुलिस निरीक्षकों की हार्ट अटैक से मौत
-स्टाफ कम और लंबी ड्यूटी बनी मुसीबत
-तीन साल में ४२७ पुलिसकर्मियों की तनाव के चलते मृत्यु
फिरोज खान / मुंबई
मुंबई में आम नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले पुलिसकर्मी खुद सुरक्षित नहीं हैं। अपराधियों से मुकाबला, कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती, वीआईपी बंदोबस्त और लगातार बढ़ता प्रशासनिक काम। इन सबके बीच पुलिसकर्मियों को पर्याप्त आराम और अपने स्वास्थ्य की देखभाल के लिए समय नहीं मिल रहा है, नतीजा ये हो रहा है कि पुलिसकर्मियों की दिल की बीमारी से मौत हो रही है। कुरार पुलिस स्टेशन के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक सुशील कुमार गायकवाड़ २७ अक्टूबर को ड्यूटी पर जाने के लिए पुलिस वाहन से सफर कर रहे थे। रास्ते में उन्होंने अस्वस्थ महसूस होने की बात अपने साथ मौजूद चालक और ऑपरेटर को बताई। उन्होंने कहा कि तबीयत ठीक नहीं लग रही है, कुछ देर गाड़ी में ही आराम कर लेते हैं। लेकिन कुरार पुलिस स्टेशन पहुंचने तक उनकी हालत बिगड़ चुकी थी। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। चिंता की बात यह है कि इसी महीने वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक शिवाजी जाधव की भी मौत हुई थी। एक महीने के भीतर दो वरिष्ठ अधिकारियों की मौत ने पुलिस महकमे में काम के दबाव, लंबी ड्यूटी और स्वास्थ्य सुविधाओं में खामी को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
तीन साल में ४२७ पुलिसकर्मियों की मौत
महाराष्ट्र विधान परिषद में जुलाई २०२५ में दी गई जानकारी के मुताबिक, वर्ष २०२२ से जून २०२५ तक मुंबई पुलिस के ४२७ कर्मियों की मौत हुई। इनमें ७५ पुलिसकर्मियों की मौत हार्टअटैक से होने की जानकारी सरकार ने दी थी।
पुलिस बल में कमी, ड्यूटी का बढ़ता बोझ
मुंबई में ९४ पुलिस स्टेशन हैं और ५१,२५९ पुलिस अधिकारियों एवं कर्मचारियों का उल्लेख है, जबकि जरूरत के हिसाब से पुलिसकर्मी बहुत कम हैं। इसके अलावा बहुत पद रिक्त पड़े हैं। ऐसे में मुंबई जैसे महानगर में अपराध नियंत्रण से लेकर यातायात व्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा तक, पुलिस पर कई स्तरों पर जिम्मेदारियां हैं। यदि उपलब्ध पुलिस बल के मुकाबले काम अधिक हो, तो कर्मचारियों को अतिरिक्त घंटे काम करना पड़ रहा है।
वरिष्ठों का दबाव, जिम्मेदारियों का बोझ
पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल अपराधों की जांच और कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है। बंदोबस्त, वीआईपी दौरे, त्योहारों की सुरक्षा, अतिक्रमण संबंधी कार्रवाई और विभिन्न प्रशासनिक विभागों से जुड़े कामों का भी दबाव रहता है। इसके अलावा वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का पालन, रिपोर्ट तैयार करना और समयसीमा में काम पूरा करने की अपेक्षा भी बनी रहती है।
