-नेतन्याहू की सत्ता पर अनिश्चितता; भारत में विपक्ष की आक्रामकता से बढ़ेगा मोदी सरकार पर दबाव?
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
इजरायल में चुनाव के बाद सत्ता का समीकरण उलझ गया है। शुरुआती चुनावी तस्वीर में किसी खेमे को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अपनी कुर्सी बचा पाएंगे या विपक्ष सत्ता तक पहुंचेगा, इसका पैâसला अंतिम नतीजों और गठबंधन की बातचीत से होगा। फिलहाल सत्ता परिवर्तन की संभावना खुली है, लेकिन उसकी पुष्टि नहीं हुई है। इजरायल में सत्ता के समीकरण को लेकर जारी अनिश्चितता के बीच सोशल मीडिया पर राजनीतिक बदलाव की चर्चाएं तेज हो गई हैं। सोशल मीडिया पर कुछ यूजर इजरायल की राजनीतिक हलचल की तुलना भारत की परिस्थितियों से करते हुए सवाल उठा रहे हैं कि क्या लंबे समय से सत्ता में मौजूद नेतृत्व के सामने अब नई राजनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती है?
`इजरायल में रिजीम चेंज, भारत में मोदी इन रेंज!’ इसी अंदाज में चल रही चर्चाओं में कुछ लोग नेतन्याहू की सत्ता पर मंडराती अनिश्चितता को मोदी सरकार के लिए भी एक राजनीतिक संकेत के तौर पर देख रहे हैं। हालांकि, दोनों देशों की राजनीतिक परिस्थितियां, चुनावी व्यवस्था और सत्ता के समीकरण अलग-अलग हैं। इजरायल की इस राजनीतिक हलचल के बीच भारत में भी आक्रामक विपक्ष और जनता की नाराजगी मोदी सरकार के सामने सत्ता परिवर्तन की चुनौती खड़ी कर सकती है।
सत्ता परिवर्तन का गणित: ४८ + १९ ृ ६७
इजरायल के शुरुआती चुनावी अनुमानों में गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्ष को ४८ और अरब पार्टियों को १९ सीटें मिलती दिख रही हैं। दोनों मिलकर ६७ सीटों तक पहुंचते हैं, १२० सदस्यीय संसद में बहुमत के लिए आवश्यक ६१ से छह अधिक। नतीजे अभी अंतिम नहीं हैं। यानी नेतन्याहू को हटाने का संख्याबल मौजूद है; चुनौती राजनीतिक सहमति की है। आइजनकोट ने अरब पार्टियों से सहयोग के लिए शर्तें रखी हैं। जॉइंट लिस्ट नेतन्याहू को हटाने में मदद करना चाहती है, लेकिन आइजनकोट सरकार में शामिल होने से उसके नीतिगत मतभेद हैं। ऐसे में बाहर से समर्थन का रास्ता भी महत्वपूर्ण हो सकता है। सरकार बन सकती है, यदि विपक्ष और अरब पार्टियां गठबंधन या समर्थन के किसी साझा समझौते तक पहुंचे।
दोनों देशों की राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं, फिर भी यह सवाल महत्वपूर्ण है कि लंबे समय से सत्ता में मौजूद नेतृत्व के खिलाफ असंतोष कब निर्णायक चुनावी ताकत बनता है। विपक्ष यदि जनता की शिकायतों को साझा राजनीतिक अभियान में बदल सके और भरोसेमंद विकल्प प्रस्तुत करे, तो सरकार पर दबाव बढ़ सकता है। सरकार के प्रति नाराजगी का वास्तविक विस्तार भी परखना जरूरी है। अलग-अलग क्षेत्रों, सामाजिक समूहों और राज्यों में असंतोष की प्रकृति तथा तीव्रता भिन्न है। इस राजनीतिक विश्लेषण की केंद्रीय बात यही है: जनअसंतोष व्यापक है और विपक्ष उसे संगठित समर्थन में बदलने में सफल होता है, तो मोदी सरकार के लिए चुनौती गंभीर हो सकती है। इजरायल में इसका उत्तर चुनावी नतीजों और गठबंधन के गणित से निकलेगा। भारत में इसकी कसौटी होगी, जनता के मुद्दों पर सरकार का प्रदर्शन और उन मुद्दों को निर्णायक जनमत में बदलने की विपक्ष की क्षमता।
ब्राजील में सत्ता की बाजी पलटी…हार के बाद देश छोड़ गए ‘राजा’!
लोकतंत्र में जनता का फैसला सबसे बड़ा होता है। चुनाव में जीत मिलने पर जनादेश का श्रेय लेने वाले नेताओं की असली परीक्षा हार के बाद होती है। ब्राजील में राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा की दोबारा जीत और पराजित उम्मीदवार फ्लावियो बोल्सोनारो के देश छोड़कर अमेरिका जाने की खबर ने इसी सवाल को चर्चा के केंद्र में ला दिया है कि जनता का नेतृत्व करने का दावा करने वाले नेता चुनावी शिकस्त के बाद जवाबदेही से कैसे निपटते हैं?
फ्लावियो बोल्सोनारो ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे हैं। राष्ट्रपति चुनाव में हार के बाद उनके अमेरिका जाने की खबर ऐसे समय सामने आई, जब उनके सामने न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े सवाल खड़े थे। रिपोर्टों के मुताबिक, कथित धनशोधन की जांच के सिलसिले में उन्हें पासपोर्ट जमा करने का न्यायिक आदेश दिया गया था। फ्लावियो इन आरोपों से इनकार करते हैं। इसलिए उनके देश छोड़ने को अपराध स्वीकार करने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। हालांकि, न्यायिक प्रक्रिया के बीच विदेश जाने की खबर ने उनकी राजनीतिक और कानूनी जवाबदेही को लेकर सवाल जरूर खड़े किए हैं।
अमेरिकी वीजा से बढ़ी राजनीतिक हलचल
इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका की भूमिका भी चर्चा का विषय बनी है। अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से फ्लावियो और उनके परिवार को वीजा देने की घोषणा ने ब्राजील के राजनीतिक विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया। सवाल यह है कि जब किसी नेता से जुड़ा मामला न्यायिक जांच के दायरे में हो, तब दूसरे देश का ऐसा फैसला राजनीतिक रूप से क्या संदेश देता है? हालांकि, वीजा जारी किए जाने को किसी गुप्त राजनीतिक साजिश या सत्ता परिवर्तन अभियान का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।
जनादेश से बड़ा कोई राजनीतिक परिवार नहीं!
ब्राजील का घटनाक्रम लोकतंत्र की एक बुनियादी सीख सामने रखता है। सत्ता किसी परिवार की निजी संपत्ति नहीं होती और चुनावी हार को स्वीकार करना भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। नेताओं को अपने खिलाफ लगे आरोपों का जवाब कानून और तथ्यों के आधार पर देना चाहिए। दूसरी ओर, जांच एजेंसियों और न्यायपालिका की कार्रवाई भी निष्पक्ष तथा पारदर्शी होनी चाहिए।
जनता का विश्वास केवल चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में जवाबदेही निभाने से कायम होता है। आखिरकार, लोकतंत्र में कोई भी नेता कानून से ऊपर नहीं है और न ही कोई राजनीतिक परिवार जनता के फैसले से बड़ा हो सकता है।
