मुख्यपृष्ठधर्म विशेषगोसेवा का संदेश : गोवत्स द्वादशी से पहले करुणा का संकल्प

गोसेवा का संदेश : गोवत्स द्वादशी से पहले करुणा का संकल्प

-शीतल अवस्थी

गाय और बछड़े की पूजा पशुधन, कृषि और पोषण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती है। पूजा तभी सार्थक है, जब पशुओं को वास्तविक संरक्षण मिले।
कार्तिक कृष्ण द्वादशी को गोवत्स द्वादशी मनाई जाती है। कई क्षेत्रों में इसे वसुबारस भी कहा जाता है तथा इससे दीपावली पर्व-श्रृंखला का आरंभ माना जाता है। इस दिन गाय और बछड़े की पूजा करके कृषि, दुग्ध उत्पादन और ग्रामीण जीवन में उनके योगदान के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है।
धार्मिक परंपरा गाय में देवशक्तियों का निवास मानती है। भगवान कृष्ण का गोपाल स्वरूप मनुष्य और पशु के आत्मीय संबंध का प्रतीक है। लेकिन गोपूजन का अर्थ केवल तिलक लगाना नहीं है; भूखी, घायल अथवा परित्यक्त गाय की देखभाल करना उसका वास्तविक रूप है।
पर्व की तैयारी में स्थानीय गोशाला की आवश्यकताओं की जानकारी प्राप्त करें। चारा, स्वच्छ जल, औषधि अथवा आर्थिक सहायता किसी प्रमाणित संस्था को दी जा सकती है। सड़क पर खड़ी गाय को प्लास्टिक में भोजन न दें। ऐसे स्थान पर चारा न रखें, जहां यातायात दुर्घटना का खतरा उत्पन्न हो।
गोवत्स द्वादशी परिवार को यह शिक्षा देती है कि उपयोग के समय पशु का सम्मान करना और अनुपयोगी लगने पर उसका परित्याग कर देना धर्मसम्मत नहीं है। करुणा, जिम्मेदारी और सुरक्षित पशुपालन ही इस पूजा का स्थायी फल है।
धार्मिक मान्यताएं आस्था का विषय हैं; पशुओं के उपचार और सुरक्षा के लिए पशु चिकित्सक की सलाह को प्राथमिकता दें।

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