-नीति आयोग की रिपोर्ट ने खोली राज्य के स्वास्थ्य तंत्र की पोल
सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र अब गंभीर स्वास्थ्य संकट के मुहाने पर खड़ा है। आलम यह है कि राज्य में हेल्थ इमरजेंसी की दस्तक सुनाई दे रही है, क्योंकि जहां शहरी क्षेत्रों में कैंसर कहर बरपा रहा है, वहीं राज्य में मोटापा धीरे-धीरे ‘धीमा जहर’ बनकर जनस्वास्थ्य को निगल रहा है। मौजूदा वक्त में राज्य में २५ फीसदी आबादी मोटापे की गिरफ्त में फंस गई हैं। एक आंकड़े के मुताबिक, हर चौथी महिला स्थूलता से ग्रस्त है। असंतुलित जीवनशैली, प्रसंस्कृत भोजन का बढ़ता सेवन और शारीरिक गतिविधियों में कमी ने मौत का खतरा कई गुना बढ़ा दिया है, वहीं नीति आयोग की रिपोर्ट ने महाराष्ट्र के स्वास्थ्य तंत्र की पोल खोलते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य अब एक ऐसे दौर में पहुंच चुका है, जहां अगर त्वरित कदम नहीं उठाए गए तो आनेवाले वर्षों में यह संकट एक राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा का रूप ले सकता है।
उल्लेखनीय है कि हाल ही में नीति आयोग द्वारा जारी किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-५ के आंकड़े बताते हैं कि १५ से ४९ वर्ष की आयु के हर चौथे व्यक्ति को मोटापे की श्रेणी में रखा गया है, यानी राज्य की लगभग २५ फीसदी आबादी मोटापे से जूझ रही है। यह आंकड़ा अपने आप में सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की घंटी बजा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, यह स्थिति मामूली नहीं, बल्कि एक विकसित होती महामारी का संकेत है। मोटापे के चलते हृदय रोग, मधुमेह, फैटी लीवर और कैंसर जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। खासतौर पर शहरी महिलाओं के बीच मोटापे की दर चिंताजनक रूप से ऊंची है और उनमें स्तन कैंसर का खतरा दोगुना पाया गया है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय कैंसर पंजीकरण कार्यक्रम के मुताबिक, देश में महिलाओं के कुल कैंसर मामलों में ३० फीसदी स्तन कैंसर है।
इससे बढ़ता है स्तन कैंसर का खतरा
वरिष्ठ ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. देवेंद्र पाल का कहना है कि मोटापा सिर्फ शरीर के वजन का मामला नहीं है, बल्कि यह चयापचय और हार्मोनल बदलावों का दुष्चक्र शुरू कर देता है। इंसुलिन प्रतिरोध, दीर्घकालिक सूजन और एस्ट्रोजेन के असंतुलन से स्तन कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। महाराष्ट्र में बढ़ता मोटापा अब केवल खानपान का नतीजा नहीं, बल्कि जीवनशैली के विघटन का दर्पण बन चुका है। शहरीकरण की तेज रफ्तार, फास्ट फूड संस्कृति और घटती शारीरिक गतिविधियां राज्य के भविष्य पर भारी पड़ रही हैं। यह स्थिति उस ‘हेल्थ इमरजेंसी’ की तरफ इशारा करती है, जहां सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति अब केवल रिपोर्टों तक सिमट गई है।
