– डाॅ. रवीन्द्र कुमार
यह अक्टूबर 1980 की घटना है। महाराष्ट्र के नासिक शहर के करीब ओझर में एक 24 वर्षीय नवयुवक का दिल्ली उसके अपने शहर में पर्यटन विभाग में नियुक्ति हो गई। वह तुरत-फुरत में त्यागपत्र दे दिल्ली नई नियुक्ति पर आ गया। घर-परिवार में खुशी का माहौल था। इस माहौल में नवयुवक को यह सुधि भी नहीं रही कि ओझर में जिस (रशियन) मैस में वह लगभग नियमित डिनर करता था उस ‘अम्मां’ का 200/- का बिल उसने नहीं दिया था। तब अपने साथियों को भी उसने इत्तिला भेजी कि वे बिल पे कर दें। किंतु किसी न किसी कारणवश ये हो न सका। सन् 1980 में पैसा ट्रांसफर करना आज सा सुगम भी तो न था।
कट टू 46 बरस बाद 2026
सन् 2026 वह 70 बरस की परिपक्व आयु का ‘नवयुवक’ मित्र लोगों के बुलावे पर नासिक आया। उसने ओझर टाउनशिप जाने-देखने की इच्छा जताई और अगले दिन नासिक शहर से 40 कि.मी. दूर दल-बल के साथ ‘ओझर’ जा पहुंचे।
‘अम्मां’ खुदा को प्यारी हो चुकीं थीं। खुदा उनको ज़न्नत में आला मुकाम अता करे। उनकी वो नन्हीं सी लड़की ‘सुल्ताना’ अब पकी उम्र की महिला बन चुकी थी। हालात आदमी को वक़्त से पहले बड़ा कर देते हैं तो बूढ़ा भी कर देते हैं। हालात के थपेड़ों के प्रहार सुल्ताना के चेहरे पर साफ झलक रहे थे। जब उस उम्र दराज ने उसके दो भाइयों फिरोज़ और बाकर के बारे में पूछा तो उसकी ज़ुबान से उनका नाम सुन सुल्ताना की आँखें छलछला उठीं कारण अब वे दोनों ही इस दुनिया में नहीं थे।
जब सुल्ताना को बताया गया कि ‘अम्मां’ के हाथों का डिनर महीनों-महीनों खाया है। और 200/- का कर्ज़ा है। उसने विनोद में कहा “मैं अब तो सूद भी लूंगी” “हां जरुर” सुनते ही वह फिर भावुक हो भीगी आंखों से बोली “मैंने कर्ज़ा माफ किया !” जब लाख मना करते-करते भी चुपचाप दो हज़ार रुपये उसकी हथेली पर रख दिये गये तो वह बेहद इमोशनल हो गई।
रशियन मैस अर्सा हुआ बंद हो चुकी थी। कैसे भी तो अम्मां की सेवाओं को देखते हुए सुल्ताना को एक छोटी सी दुकान (कियोस्क) आबंटित कर दिया था। उसी से सुल्ताना अपने परिवार का भरण-पोषण कर रही थी। उसने अपने कियोस्क का नाम बड़े अरमानों से ‘दावत’ रखा। अपनी बेटी नसीम की शादी भी की। शायद इस घटना से सुल्ताना के मन में एक छोटी और क्षणिक ही सही खुशी की लहर जरुर आई होगी।
