– मिलावटखोरों के सामने एफडीए भी है लाचार
-केमिकल जांचने के लिए टेस्टिंग सिस्टम नहीं
फिरोज खान / मुंबई
पायधुनी में तरबूज खाने के बाद एक ही परिवार के ४ लोगों की मौत होने के बाद एफडीए की सबसे बड़ी कमी का पर्दाफाश हुआ है। मुंबई में बिकनेवाले फल और सब्जियों में कीटनाशक की तो मात्रा रहती ही है, इन्हें पकाने और चमकदार बनाने के लिए जो केमिकल यूज किया जा रहा है, वो मुंबईकरों के लिए साइलेंट किलर का काम कर रहा है।
हैरान कर देने वाली जानकारी यह है कि फलों और सब्जियों को जल्दी पकाने, रंग और मिठास लाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले जहरीले केमिकल का पता लगाने के लिए एफडीए के पास कोई सिस्टम नहीं है। यही वजह है कि मिलावटखोर बेखौफ होकर खतरनाक केमिकल का इस्तेमाल कर फलों और सब्जियों को समय से पहले पकाकर पैसे कमाने का धंधा कर रहे हैं। इसका नतीजा अवाम की सेहत और जिंदगी पर पड़ रहा है।
साफ जवाब में देरी
एफडीए ने तरबूज कांड के बाद तरबूज और बिरयानी के सैंपल जब्त कर लिए हैं। हालांकि, एफडीए इस सवाल का साफ जवाब देने में देरी कर रहा है कि इन सैंपल में जहरीले तत्व पाए गए थे या नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि एफडीए के पास खाने में जहरीले पदार्थ, पेस्टिसाइड के बचे हुए हिस्से की जांच के लिए जरूरी विशेष टेस्टिंग सिस्टम नहीं है।
दे दी क्लीन चिट
एफडीए के मुताबिक, मौजूदा सामान्य जांच सिस्टम के आधार पर अभी तक तरबूज में कोई जहरीला पदार्थ नहीं मिला है इसलिए इसे ‘क्लीन चिट’ दे दी गई है।
स्लो पॉइजन
जानकारों का कहना है कि फलों और सब्जियों में मिलाए जाने वाले केमिकल स्लो पॉइजन का काम करते हैं। लोग सेहत बनाने के लिए फल खाते हैं, लेकिन उसमें विषैले पदार्थ होने की वजह से वह उन्हें गुमनाम मौत की तरफ ले जाते हैं। केमिकल मिक्स फल नियमित खाने से लोग कई बीमारियों का शिकार हो जाते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता है कि जानलेवा बीमारी कहां से मिली।
फलों और सब्जियों की जांच पर केंद्र उदासीन!
पायधुनी में तरबूज खाने से चार लोगों की हुई मौत के बाद लोगों के निशाने पर एफडीए है। जबकि एफडीए के पास विषैले तत्वों की जांच के लिए विशेष जांच सिस्टम है ही नहीं। वह उसी पुरानी तकनीक का इस्तेमाल करके खानापूर्ति कर रही है। इस मामले में केंद्र सरकार भी उदासीन है।
बता दें कि एफडीए प्रशासन ने एक खास नए टेस्टिंग सिस्टम के लिए केंद्र सरकार से बात की थी। कुछ साल पहले इस बारे में प्रपोजल को मंजूरी मिल गई थी और टेंडर प्रोसेस शुरू हो गया था, लेकिन फिर केंद्र ने लापरवाही दिखाई और मामला ठंडे बस्ते में चला गया। यह वजह है कि तरबूज में कोई जहरीले पदार्थ था या नहीं, इस पर एफडीए कोई ठोस जानकारी नहीं दे पा रहा है। नाम न छापने की शर्त पर एक एफडीए अधिकारी ने बताया कि पिछले कुछ सालों में फलों और सब्जियों को जल्दी पकाने के लिए पेस्टिसाइड और केमिकल का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। इसलिए खाने की चीजों में मिलावट, उसमें मौजूद जहरीले तत्वों का सेहत पर क्या असर होता है और यह कितना असर करता है, यह जानने के लिए टेस्टिंग की जरूरत है, लेकिन फिलहाल एफडीए के पास खास टेस्टिंग सिस्टम नहीं है। ऐसे में फलों, सब्जियों या किसी और खाने की चीज में जहरीले तत्व हैं या नहीं, यह जांचने के लिए सैंपल फोरेंसिक या एग्रीकल्चर लैब में भेजे जाते हैं। इसमें बहुत वक्त लगता है और कई बार मामला ठंडा भी पड़ जाता है।
