हनीफ जवेरी
‘शिकवा न कर हसरत जमाने के खुदाओं से,
दुनिया बड़ी जालिम है, दमसाज नहीं होती।
वो खुद ही समझ लेगा, मुख्तार-ए-दो आलम है,
अल्लाह की लाठी में आवाज नहीं होती।’
यह शायरी प्रसिद्ध स्वर्गीय गीतकार हसरत जयपुरी ने उस समय लिखी थी, जब उनके लिखे मुखड़े को गीतकार इंदीवर ने चुराकर उस पर फिल्म आंखें के लिए पूरा गाना ही लिख दिया था।
यह शायरी उन्होंने अपनी बेटी किश्वर को यह कहकर दी थी कि वह इसे संभालकर अपने पास रखे। वास्तव में हसरत बेझिझक अपने दोस्तों के साथ अपना लिखा कलाम शेयर करते थे। ऐसी ही एक महफिल में उन्होंने इंदीवर के सामने एक गीत का मुखड़ा सुनाया, जो कुछ यूं था-
‘ओ काले बुर्वेâ वाली, तेरा नाम तो बता,
जाएगी कहां, वह मकान तो बता…’
इस मुखड़े की खूबी यह थी कि मजबूरी में अगर चेहरा नहीं बता सकती तो नाम ही बता दे। लेकिन इस खूबी को दरकिनार कर इंदीवर ने लिखा, `ओ लाल दुपट्टे वाली, तेरा नाम तो बता…’ अपने मुखड़े पर लिखे गए इस गाने को लेकर हसरत बहुत नाराज हुए और उन्होंने अपनी भड़ास उक्त शायरी लिखकर अपनी बेटी को थमा दी।
हसरत दोस्तों के बेहद करीबी थे। वे अक्सर अपने दोस्तों और उनकी दोस्ती पर यूं ही शेर कह दिया करते थे। उनकी यह शायरी किसी फिल्म या महफिल के लिए नहीं होती थी, बल्कि वे उसे अपनी निजी डायरी में लिखकर रखते थे।
ऐसी ही एक कविता उन्होंने अपने मित्र, संगीतकार जयकिशन की अचानक मृत्यु के बाद लिखी थी। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि शंकर और जयकिशन के अलगाव के बाद शंकर के लिए गीत शैलेंद्र, और जयकिशन के लिए हसरत लिखा करते थे।
अपने दोस्त की अचानक मौत पर पहली बार उनके दोस्तों ने उन्हें एक बच्चे की तरह रोते हुए देखा। यह मंजर उनकी बेटी किश्वर को आज भी याद है, जबकि वह उस वक्त काफी छोटी थीं। किश्वर कहती हैं कि दिवाली हो या ईद, अब्बाजान ये दोनों त्योहार अंकल जयकिशन के साथ ही मनाते थे। दिवाली के रोज मिठाई का डिब्बा लेकर सबसे पहले जयकिशन अंकल घर आते और ईद के दिन उनके घर अब्बा पहुंचते थे। जयकिशन की मौत के तीसरे दिन उनकी याद में जो कलाम हसरत ने लिखा, वह आज भी बेटी किश्वर ने संभाल कर रखा है, जो यूं था-
‘मेरे बिछड़े हुए साथी, मेरे मनचाहे सनम,
हसरतें उड़ नहीं सकतीं, उन्हें परवाज तो दो,
तुम कहां, कौन-सी मंजिल पर रहा करते हो,
तुम जहां भी हो, खुदा के लिए आवाज तो दो।’
यूं तो हसरत का बस चलता तो वह बातचीत भी शायरी में करते। एक बार उनकी बेगम बिलकिस उनसे किसी बात को लेकर इस कदर खफा हो गर्इं कि रूठकर उन्होंने उनसे बात करना ही बंद कर दिया। तब हसरत ने उन्हें उनकी पसंद के मोगरे के फूलों का एक गुच्छा लाकर पेश किया। वह मुस्कुरा पड़ीं और हसरत ने कहा, ‘अजी रूठकर अब कहां जाइएगा… जहां जाइएगा हमें पाईएगा।’
आगे चलकर उन्होंने इसका इस्तेमाल फिल्म आरजू में गायक और गायिका दोनों के लिए किया और यह गाना सुपरहिट हुआ। हसरत जयपुरी दिलफेंक इंसान थे, लेकिन उन्होंने कभी अपनी पत्नी से बेवफाई नहीं की। सच तो यह है कि जब तक उनकी पत्नी दस्तरखान पर नहीं बैठती थीं, तब तक वह खाने का एक दाना भी मुंह में नहीं डालते थे। उनके लिए उनकी बेटी किश्वरी ही सब कुछ थी।
अगर किसी ने उनके योगदान की सही कद्र की तो वह राजस्थान सरकार थी, जिसने हसरत जयपुरी को ‘राजस्थान श्री’ और ‘राजस्थान रत्न’ पुरस्कारों से सम्मानित किया। जयपुर स्थित हसरत के पुश्तैनी मकान ‘फिरदौसी मंजिल’ तक जाने वाली सड़क का नाम भी ‘हसरत जयपुरी मार्ग’ रखा गया।
