संजय राऊत
भारत की मौजूदा राजनीति की सटीक परिभाषा क्या है, यह एक स्थान पर आचार्य रजनीश ने बताया है –
‘राजनीति एक ऐसा खेल है, जिसे अमीर ‘चालाक’ लोग खेलते रहते हैं और मूर्ख दिनभर उस पर चर्चा करते रहते हैं।’
भारत में वर्तमान में दो राजनीतिक विषयों पर चर्चा जारी है। पहली, पश्चिम बंगाल में क्या परिणाम निकलेगा और दूसरी, आम आदमी पार्टी यानी ‘आप’ क्यों टूटी? पश्चिम बंगाल की स्थिति लोकतंत्र के लिए भयानक है। ममता बनर्जी की हार हो, इसी एक विचार का भूत प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह को चढ़ा हुआ है। ममता की हार सुनिश्चित करने के लिए पश्चिम बंगाल के मैदान में अर्धसैनिक बलों की लाखों फौजें उतार दी गई हैं। टैंकों जैसी गाड़ियां भी बंगाल की सड़कों पर घूम रही हैं। राफेल, सुखोई, एळ ४००, अग्नि, पृथ्वी, ब्रह्मोस मिसाइलें और पनडुब्बियों का उपयोग करना संभव होता तो मोदी और शाह बंगाल में वह भी करते। लेकिन भाजपा से वह एक चूक हो गई। बाकी सभी युद्ध सामग्रियों का उपयोग उन्होंने किया। पश्चिम बंगाल की मतगणना के बाद यदि कोई लोकतंत्र का इतिहास लिखेगा तो उन्हें जरूर दर्ज करना होगा कि राफेल और सुखोई जैसे शस्त्रों का स्ट्रैटेजिक उपयोग नहीं किया गया इसलिए भाजपा बंगाल के युद्ध में पराजित हुई। चुनाव आयोग ने इस युद्ध में विभीषण की भूमिका निभाई, फिर भी अगर भाजपा नहीं जीती, तो यह इतिहास में दर्ज होगा। पश्चिम बंगाल का परिणाम इससे अलग होगा, ऐसा मुझे आज तो नहीं लगता।
शालीनता का अंत
भारतीय राजनीति की सारी शालीनता समाप्त हो गई है। राज्यसभा में ‘आप’ के सात सांसद राघव चड्ढा के नेतृत्व में अलग हुए और सीधे भाजपा में विलीन हो गए। दलबदल कानून के तहत इन सब पर कार्रवाई होनी चाहिए, ऐसा पत्र ‘आप’ के श्री संजय सिंह ने लिखा। राज्यसभा के सभापति ने ‘आप’ के पत्र का संज्ञान तक नहीं लिया और न ही कोई सुनवाई की। सात सांसदों को उन्होंने भाजपा का तिलक लगाया और सीधे ‘वॉशिंग मशीन’ में डालकर पवित्र कर दिया। पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर अमीरों और उद्योगपतियों को उम्मीदवार बनाने से क्या परिणाम होता है, इसका अनुभव वर्तमान में अरविंद केजरीवाल ले रहे हैं। राघव चड्ढा की फाइव स्टार ‘लाइफस्टाइल’ का ‘आम आदमी’ से कोई संबंध नहीं है। ‘आम आदमी’ पार्टी छोड़कर जो भाजपा में गए, वे सभी राज्यसभा सांसद अत्यधिक संपत्ति के स्वामी हैं। अशोक मित्तल की ‘लवली यूनिवर्सिटी’ है, जिसका टर्नओवर छह हजार करोड़ है। मित्तल का जालंधर में दस एकड़ में घर है, जिसे ‘लवली एस्टेट’ के नाम से जाना जाता है। उस घर की कीमत २०० करोड़ है। उनके पास मर्सिडीज, एस क्लास, टोयोटा वेलफायर जैसी महंगी गाड़ियों का काफिला है। ‘आप’ के एक और सांसद राजिंदर गुप्ता भी भाजपा में चले गए। वे दुनिया के बड़े ‘ट्राइडेंट ग्रुप’ होटल समूह के चेयरमैन हैं। उनकी अमीरी का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। वे कम से कम पांच हजार करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं। राजनीति और समाजसेवा से उनका कोई संबंध नहीं है, लेकिन ऐसे लोग करोड़ों रुपए खर्च करके और पार्टी को चंदा देकर ‘राज्यसभा’ की सदस्यता खरीद लेते हैं और संसद की गरिमा समाप्त कर देते हैं। जब ‘आम आदमी’ पार्टी बनी थी, तब ऐसे अनगिनत महत्वाकांक्षी अमीरों की फौज केजरीवाल के इर्द-गिर्द खड़ी हो गई थी। उनमें से कुछ की आकांक्षाएं पूरी हुर्इं और जिन्हें कुछ नहीं मिला, वे केजरीवाल से दूर हो गए। प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, आशुतोष और किरण बेदी जैसे लोग बाहर निकल गए। इनमें से किसी को भी केजरीवाल ने राज्यसभा नहीं भेजा। उन्हें डर था कि ये लोग वैचारिक रूप से उन पर भारी पड़ेंगे और उनके नेतृत्व के लिए खतरा पैदा करेंगे। लेकिन जिन अमीरों को उन्होंने राज्यसभा भेजा, वे भी अंतत: दगाबाज निकले। यह पार्टी के विचार और मूल आधार के नष्ट होने का ही परिणाम है।
दयनीय अवस्था
राज्यसभा जैसी संवैधानिक संस्थाओं की हमने दुर्गति कर दी है। विधान परिषदों और राज्यसभा के चुनावों में अब सीधे हॉर्स ट्रेडिंग खरीद-फरोख्त होता है। विधायकों के मत करोड़ों में खरीदे जाते हैं और राज्यसभा की उम्मीदवारी पाने के लिए पार्टी प्रमुखों को करोड़ों का नजराना दिया जाता है। यह रुकेगा वैâसे? राजनीतिक दल, वर्तमान लोकतंत्र और हाईकमान संस्कृति के कारण राज्यसभा एक नाट्यशाला बन गई है। किसी भी अन्य देश में लोकतंत्र के नाम पर राज्यसभा यानी उच्च सदन की ऐसी दयनीय अवस्था नहीं हुई होगी। भारत में राज्यसभा ‘state of council’ है, जो संघ राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है। भारत में राज्यसभा के लिए ‘विधायक’ मतदान करते हैं। प्रत्येक राज्य को उनके विधायकों की संख्या के अनुसार सीटें मिलती हैं। कई बार इसमें पार्टी का हाईकमान ही निर्णायक होता है। इसमें खुलेआम पैसों का लेन-देन होता है। उद्योगपतियों को ‘पैराशूट’ बनाकर सीटें दी जाती हैं इसलिए राज्यसभा अनुभवी नेताओं का सदन (house of elders) न रहकर केवल दलीय राजनीति और सौदेबाजी का साधन बनकर रह गई है। अमेरिका की सीनेट १९१३ तक राज्यसभा की तरह ही अप्रत्यक्ष (Indirect) रूप से चुनी जाती थी, लेकिन जब यह ध्यान में आया कि इसमें भ्रष्टाचार हो रहा है तो १७वां संशोधन करके चुनाव प्रत्यक्ष (Direct) कर दिया गया।
ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, मेक्सिको, इटली, जापान, पोलैंड और फिलीपींस… सभी जगह अब Direct चुनाव होते हैं। मतदाता ही स्वयं सीनेटर्स को चुनते हैं। जर्मनी का Bundesrat पूरी तरह से एक अलग मॉडल है। वहां की १६ राज्य सरकारें अपने मंत्रियों (प्रधानमंत्री + वैâबिनेट) को बर्लिन के ऊपरी सदन में भेजती हैं। वहां कोई भी सीट खरीदी नहीं जा सकती और विधायकों को रिश्वत देने का सवाल ही नहीं उठता।
फ्रंस में १.५ लाख ‘ग्रैंड इलेक्टर्स’ (मेयर, काउंसलर, क्षेत्रीय प्रतिनिधि) होते हैं। इतनी बड़ी संख्या को रिश्वत देना बहुत मुश्किल होता है। लेकिन भारत में यदि ऐसी कोई पद्धति हो भी, तो यहां कितने भी लोगों को रिश्वत देनेवाली व्यवस्था तैयार रहती है। भारत में सब कुछ संभव है।
विधान परिषद और राज्यसभा के चुनाव घोषित होते ही राजनीतिक दलों को अपने विधायकों के इर्द-गिर्द घेराबंदी करनी पड़ती है। विधायकों का अपहरण होगा या पैसे देकर उन्हें खरीद लिया जाएगा, यह डर अब स्थायी हो गया है। स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव से विधान परिषद जाने के लिए पचास-सौ करोड़ का खर्च होता है। जिसके पास इतना धन है, वही जिला स्तर पर चुनाव लड़ेगा, ऐसा चित्र हर जगह दिखाई देता है। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा में महाराष्ट्र से जो लोग भेजे हैं, वे उनके जमीनी स्तर पर काम करनेवाले कार्यकर्ता हैं। विधान परिषद चुनाव के उम्मीदवारों की उनकी सूची ‘दरियां’ उठानेवाले कार्यकर्ताओं की है। यही चित्र शिवसेना का भी दिखाई देता है। उद्धव ठाकरे अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान विधान परिषद के लिए चुने गए थे। उनकी परिषद की अवधि अब समाप्त हो गई है। उद्धव ठाकरे ने अपनी जगह पर अब कार्यकर्ता अंबादास दानवे को भेजा है। यह चित्र आशाजनक दिखाई देता है।
चक्र चलता रहेगा
भारतीय जनता पार्टी ने देश के लगभग सभी दल तोड़कर दिखा दिए। भाजपा को यह तोड़-फोड़ इसलिए रास आती है क्योंकि चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय जैसे संस्थान उसकी जेब में हैं। दलबदल और पार्टी विभाजन के विरुद्ध न्याय मांगने के सभी द्वार प्रधानमंत्री मोदी ने बंद कर दिए हैं। ‘निष्पक्षता’ शब्द को भारतीय राजकोश (राजनीतिक शब्दकोश) से बाहर कर दिया गया है। इसलिए संवैधानिक पदों पर आसीन प्रत्येक व्यक्ति पक्षपात को ही अपना धर्म मानकर कार्य कर रहा है।
‘आप’ के सात अमीर सांसद टूट गए। अमीरों की भारतीय जनता पार्टी ने उनके स्वागत में पलक-पांवड़े बिछा दिए। भारतीय जनता इस पर केवल चर्चा कर रही है और यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा!
